Monday, February 23, 2026
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उच्च शिक्षण संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियों पर मंथन, रोकथाम और एआई की भूमिका पर जोर

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में “मेन्टल हेल्थ चैलेंजेज एन्ड साइकोलॉजिकल वेल बीइंग इन हायर एजुकेशनल इंस्टिट्यूशन्स” विषय पर एक दिवसीय सिम्पोजियम आयोजित हुआ, जिसमें विशेषज्ञों ने उच्च शिक्षण संस्थानों में बढ़ते तनाव, अवसाद और प्रतिस्पर्धात्मक दबाव को गंभीर चुनौती बताते हुए रोकथाम, समय पर पहचान और तकनीकी सहयोग को आवश्यक बताया। कार्यक्रम में विद्यार्थियों के साथ इंटरैक्शन सत्र भी हुआ, जहां मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी शंकाओं का समाधान किया गया।
अधिष्ठाता छात्र कल्याण एवं मनोविज्ञान विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में फ्रीडम फ्रॉम पॉवर्टी ट्रस्ट (इंडिया) एवं मानसिक शक्ति फाउंडेशन का सहयोग रहा। अध्यक्षता कुलपति प्रो. पूनम टंडन ने की।
मुख्य वक्ता के रूप में अमरेश श्रीवास्तव, प्रोफेसर एमेरिटस, Western University (कनाडा) ने कहा कि “जैसे हैं, वैसे ही स्वयं को स्वीकार करना मानसिक स्वास्थ्य की दिशा में पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम है।” उन्होंने स्पष्ट किया कि व्यक्ति की वास्तविक स्थिति और उसकी अपेक्षाओं के बीच असंतुलन तनाव को जन्म देता है। विशेष रूप से 14 से 17 वर्ष आयु वर्ग के किशोरों में मानसिक स्वास्थ्य की रोकथाम पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि यह आयु वर्ग अत्यंत संवेदनशील है, इसलिए समय रहते जागरूकता और परामर्श अनिवार्य है।
बी.आर.डी. मेडिकल कॉलेज गोरखपुर के मनोरोग विभागाध्यक्ष डॉ. तापस के. आइच ने कहा कि मानसिक बीमारी सीधे जीवन नहीं लेती, बल्कि व्यक्ति को अक्षम बनाकर उसके जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करती है। यदि समय पर पहचान, संवेदनशील दृष्टिकोण और उचित उपचार उपलब्ध कराया जाए तो प्रभावित व्यक्ति संतुलित जीवन की ओर लौट सकता है।
मेडिकल कॉलेज अयोध्या में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. कुँवर वैभव ने मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं में एआई की उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता सेवाओं की सुलभता बढ़ाने, मानसिक रोगों से जुड़े सामाजिक कलंक (स्टिग्मा) को कम करने तथा जरूरतमंदों को निरंतर सहयोग प्रदान करने में प्रभावी हो सकती है। एआई तकनीक सामाजिक संवेदनशीलता और मानवीय सहयोग का सशक्त माध्यम बनकर उभर रही है।
अध्यक्षीय संबोधन में कुलपति प्रो. पूनम टंडन ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य के बिना शिक्षा की यात्रा सुचारु रूप से आगे नहीं बढ़ सकती। प्रतिस्पर्धी वातावरण में विद्यार्थियों के लिए मानसिक संतुलन और भावनात्मक सुदृढ़ता अत्यंत आवश्यक है। विश्वविद्यालय मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में सतत प्रयास कर रहा है, जो विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास और स्वस्थ शैक्षणिक वातावरण निर्माण में सहायक होंगे।
कार्यक्रम संयोजक एवं डीएसडब्ल्यू प्रो. अनुभूति दुबे ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि वर्तमान समय में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक और संवेदनशील होना आवश्यक है। विद्यार्थियों में बढ़ते तनाव, अवसाद और दबाव को देखते हुए कुछ विभागों में काउंसलिंग सेल स्थापित किए जाने की योजना है।
स्वागत भाषण मनोविज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. धनंजय कुमार ने दिया, संचालन डॉ. गरिमा सिंह ने किया तथा आभार ज्ञापन डॉ. विस्मिता पालीवाल ने किया। कार्यक्रम में प्रति कुलपति प्रो. शांतनु रस्तोगी, डीन प्रो. कीर्ति पाण्डेय, कृषि निदेशक डॉ. आर.आर. सिंह सहित विभिन्न विभागों के शिक्षक, शोधार्थी एवं छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। एनएसएस, एनसीसी, फार्मेसी के छात्र एवं मनोविज्ञान विभाग के शोधार्थियों की सक्रिय भागीदारी रही।

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