मुंबई (राष्ट्र की परम्परा लेख डेस्क)महाराष्ट्र का वर्तमान छत्रपति संभाजीनगर (पूर्व नाम औरंगाबाद) इतिहास के पन्नों में एक विशेष स्थान रखता है। यह शहर कभी मुगल शासन के दक्कन प्रांत की राजधानी था। हालांकि यह तत्कालीन हिंदवी स्वराज का हिस्सा नहीं था, फिर भी छत्रपति शिवाजी महाराज की औरंगाबाद यात्रा ने इसे मराठा इतिहास में अमर कर दिया।
अप्रैल 1666 में जब छत्रपति शिवाजी महाराज आगरा की ओर प्रस्थान कर रहे थे, तब उनका यह पड़ाव राजनीतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था। इस यात्रा के दौरान संभाजीनगर में जो जनसैलाब उमड़ा, वह उनके बढ़ते प्रभाव और लोकप्रियता का प्रमाण था।
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पुरंदर की संधि के बाद आगरा की ओर प्रस्थान
1665 में हुई पुरंदर की संधि मराठा-मुगल संबंधों का निर्णायक मोड़ थी। इस संधि के बाद शिवाजी महाराज को मुगल बादशाह से मिलने आगरा जाना था। यह यात्रा राजनीतिक कूटनीति और रणनीतिक सोच का हिस्सा थी।
इस यात्रा में उनके साथ लगभग 200 से 500 सुसज्जित सैनिक थे। विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों में संख्या में अंतर मिलता है, परंतु यह स्पष्ट है कि उनका काफिला शाही गरिमा से युक्त था।
औरंगाबाद में उमड़ा जनसैलाब
जब छत्रपति शिवाजी महाराज की औरंगाबाद यात्रा के दौरान उनका काफिला शहर में पहुँचा, तो हजारों की भीड़ उनके दर्शन के लिए उमड़ पड़ी।
मुगल प्रशासन के अधिकारी भीमसेन सक्सेना ने अपने फारसी संस्मरण तारीख-ए-दिलकुश में इस घटना का विस्तृत वर्णन किया है। इस ग्रंथ का बाद में प्रसिद्ध इतिहासकार जदुनाथ सरकार ने अंग्रेजी में अनुवाद किया।
संस्मरण में उल्लेख है कि शिवाजी महाराज के घुड़सवारों का अनुशासन, उनके शाही वस्त्र और जनता का उत्साह अभूतपूर्व था। यह दृश्य बताता है कि मराठा नेता का प्रभाव केवल उनके राज्य तक सीमित नहीं था।
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शाही काफिले का भव्य स्वरूप
29 मई 1666 को आमेर राज्य के अधिकारी परकालदास द्वारा लिखे गए एक पत्र में शिवाजी महाराज के काफिले का सजीव वर्णन मिलता है।
काफिले में शामिल थे:सोने-चांदी से मढ़ी पालकी,हौदे से सुसज्जित दो हाथी,सामान ढोने वाले ऊंट,100 से अधिक घुड़सवार,स्वर्ण जड़ित नारंगी-सिंदूरी ध्वज,परकालदास ने लिखा कि शिवाजी महाराज दुबले-पतले, गोरे रंग के और अत्यंत प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी थे। उनके साथ उनके नौ वर्षीय पुत्र संभाजी महाराज भी उपस्थित थे।
पत्र में एक उल्लेखनीय पंक्ति थी—“उन्हें देखकर सहज ही लगता है कि वे जनता के शासक हैं।”
दक्कन की राजनीति और शिवाजी का बढ़ता प्रभाव
उस समय औरंगाबाद मुगल सत्ता का महत्वपूर्ण केंद्र था। वहां शिवाजी महाराज का भव्य स्वागत इस बात का संकेत था कि दक्कन की राजनीति में उनका प्रभाव बढ़ रहा था।
छत्रपति शिवाजी महाराज की औरंगाबाद यात्रा केवल एक पड़ाव नहीं थी, बल्कि यह उनके कद और नेतृत्व की स्वीकृति का प्रतीक थी। मुगल राजधानी की ओर जाते समय जिस प्रकार जनता ने उनका स्वागत किया, वह मराठा शक्ति के उभार का सार्वजनिक प्रदर्शन था।
आगरा यात्रा और ऐतिहासिक मोड़
आगरा पहुँचने के बाद शिवाजी महाराज और औरंगजेब की भेंट इतिहास का चर्चित प्रसंग है। दरबार में अपेक्षित सम्मान न मिलने के कारण उत्पन्न तनाव ने आगे चलकर शिवाजी की ऐतिहासिक आगरा से पलायन की कहानी को जन्म दिया।
लेकिन उससे पहले छत्रपति शिवाजी महाराज की औरंगाबाद यात्रा ने यह सिद्ध कर दिया था कि वे केवल एक क्षेत्रीय शासक नहीं, बल्कि जननायक बन चुके थे।
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संभाजीनगर नामकरण और ऐतिहासिक स्मृति
औरंगाबाद का नाम पूर्व मुगल शासक औरंगजेब के नाम पर रखा गया था। वर्ष 2023 में इसका नाम बदलकर छत्रपति संभाजीनगर कर दिया गया, जो मराठा विरासत के सम्मान का प्रतीक है।
आज जब शिवाजी महाराज की जयंती मनाई जाती है, तो छत्रपति शिवाजी महाराज की औरंगाबाद यात्रा का यह प्रसंग विशेष रूप से स्मरण किया जाता है।
इतिहास में दर्ज अमिट छाप
इतिहासकारों के अनुसार, यह यात्रा केवल राजनीतिक औपचारिकता नहीं थी। यह एक ऐसे युग की शुरुआत थी, जिसमें मराठा शक्ति ने मुगल साम्राज्य को खुली चुनौती दी।
छत्रपति शिवाजी महाराज की औरंगाबाद यात्रा ने दिखाया कि जनता का समर्थन किसी भी शासक की सबसे बड़ी ताकत होती है। दक्कन की धरती पर उमड़ा वह जनसैलाब आज भी इतिहास की स्मृतियों में जीवित है।
अप्रैल 1666 की यह ऐतिहासिक घटना भारतीय इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है। संभाजीनगर में उमड़ी भीड़ ने यह स्पष्ट कर दिया था कि शिवाजी महाराज केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि जन-जन के नेता थे।
छत्रपति शिवाजी महाराज की औरंगाबाद यात्रा मराठा गौरव, कूटनीति और नेतृत्व क्षमता का जीवंत उदाहरण है।
