सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र सिकंदरपुर में ओवरडोज इंजेक्शन का आरोप, 3 वर्षीय बच्ची की हालत बिगड़ी
सिकंदरपुर / बलिया (राष्ट्र की परम्परा)।उत्तर प्रदेश के बलिया जनपद स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र सिकंदरपुर से स्वास्थ्य सेवाओं में गंभीर लापरवाही का मामला सामने आया है। मोहल्ला गांधी नगर निवासी दानिश अपनी 3 वर्षीय मासूम बच्ची को उपचार के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र सिकंदरपुर लेकर पहुंचे थे। परिजनों का आरोप है कि अस्पताल के एक कर्मचारी द्वारा बच्ची को दवा का ओवरडोज इंजेक्शन लगा दिया गया, जिससे उसकी तबीयत अचानक बिगड़ गई।
परिजनों के अनुसार, चिकित्सक द्वारा पर्चे पर लिखी गई दवा की मात्रा को ठीक से समझे बिना कर्मचारी ने इंजेक्शन लगा दिया। इंजेक्शन लगने के कुछ ही समय बाद बच्ची को तेज बेचैनी, असहजता और तबीयत में गिरावट महसूस होने लगी। हालात बिगड़ते देख परिजन घबरा गए और तत्काल अस्पताल स्टाफ से जानकारी मांगी।
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बताया जा रहा है कि अस्पताल के कर्मचारियों ने स्वीकार किया कि दवा पढ़ने में गलती हो सकती है। हालांकि, इस बात को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है कि डॉक्टर ने पर्चे पर कितनी मात्रा लिखी थी और वास्तव में इंजेक्शन में कितनी मात्रा दी गई। इसी असमंजस ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है।
घटना के बाद से परिजनों में भारी आक्रोश है। उनका कहना है कि यदि समय रहते बच्ची को सही उपचार नहीं मिलता, तो यह मामला एक बड़े हादसे में बदल सकता था। परिजनों ने पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच की मांग की है और दोषी कर्मचारियों पर सख्त कार्रवाई की अपेक्षा जताई है।
स्थानीय लोगों ने भी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र सिकंदरपुर में दवा वितरण, इंजेक्शन प्रक्रिया और मरीजों के उपचार प्रणाली की पारदर्शी जांच की मांग की है। लोगों का कहना है कि यदि सब कुछ नियमानुसार था, तो फिर अधीक्षक द्वारा पुलिस को बुलाए जाने की आवश्यकता क्यों पड़ी—यह भी जांच का विषय है। सूत्रों के अनुसार, मामले की आंतरिक जांच शुरू कर दी गई है, लेकिन अस्पताल प्रशासन की ओर से अब तक कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।
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स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी अस्पतालों में बच्चों के इलाज के दौरान दवा की मात्रा को लेकर अत्यधिक सावधानी बरतना अनिवार्य है। एक छोटी सी लापरवाही मासूम की जान के लिए खतरा बन सकती है। ऐसे में ओवरडोज इंजेक्शन जैसे आरोप स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
यह मामला न केवल सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र सिकंदरपुर की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है, बल्कि सरकारी अस्पतालों में स्टाफ ट्रेनिंग और निगरानी व्यवस्था को भी कटघरे में खड़ा करता है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस प्रकरण में कितनी पारदर्शिता के साथ कार्रवाई करता है और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं।
