राम ब सेना के साथ लंका पर चढ़ाई — धर्म के लिए संघर्ष का अमर संदेश
रामायण केवल एक महाकाव्य नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है। एपिसोड–14 में हनुमान जी की शास्त्रोक्त कथा के माध्यम से हम उस ऐतिहासिक क्षण को देखते हैं, जब राम सेना लंका पर चढ़ाई करती है। यह कथा केवल युद्ध का वर्णन नहीं, बल्कि धर्म के लिए संघर्ष, न्याय, नीति, संयम और सामूहिक साहस का अद्भुत उदाहरण है। हनुमान जी यहाँ शक्ति के नहीं, विवेक और भक्ति के प्रतीक बनकर उभरते हैं।
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समुद्र-तट पर निर्णय: संकल्प की परीक्षा
लंका विजय से पूर्व समुद्र-तट पर राम सेना का ठहराव एक निर्णायक क्षण था। सामने अथाह सागर, पीछे धैर्य और भीतर संकल्प। भगवान श्रीराम का आदेश स्पष्ट था—धर्म का मार्ग अपनाया जाए। हनुमान जी ने यहाँ नेतृत्व नहीं छीना, बल्कि नेतृत्व को दिशा दी।
उन्होंने वानर सेना का मनोबल बढ़ाया और बताया कि धर्म के लिए संघर्ष में अनुशासन और नीति ही सबसे बड़ा अस्त्र हैं।
राम सेतु: श्रम, सहयोग और श्रद्धा
समुद्र पर सेतु-निर्माण केवल वास्तु-कौशल नहीं, सामूहिक भक्ति का उत्सव था। नल-नील के मार्गदर्शन में, हनुमान जी की प्रेरणा से वानर-भालुओं ने पत्थर उठाए।
यहाँ संदेश स्पष्ट था—जब उद्देश्य धर्म हो, तब असंभव भी संभव हो जाता है। हनुमान जी रामायण में यह प्रसंग आज भी कर्मयोग का श्रेष्ठ उदाहरण माना जाता है।
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लंका की सीमा पर: विवेक बनाम अहंकार
सेतु पार करते समय हनुमान जी ने सेना को संयम का पाठ पढ़ाया। उनका उद्देश्य विध्वंस नहीं, न्याय था। लंका की भव्यता और रावण का अहंकार—दोनों के बीच धर्म की पताका फहराने का संकल्प दृढ़ हुआ।
हनुमान जी ने गुप्तचरी, रणनीति और मर्यादा—तीनों का संतुलन बनाए रखा। यही कारण है कि लंका पर चढ़ाई केवल युद्ध नहीं, नीति-युद्ध बन गई।
युद्ध की आहट: साहस और अनुशासन
जैसे ही युद्ध की आहट हुई, हनुमान जी ने सेना को भय नहीं, लक्ष्य याद दिलाया। उन्होंने स्पष्ट कहा—“धर्म के लिए संघर्ष में क्रोध नहीं, कर्तव्य प्रधान है।”
युद्ध-भूमि में उनका पराक्रम शौर्य का पर्याय बना, पर हर प्रहार में मर्यादा झलकी। यही राम सेना लंका की पहचान बनी।
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हनुमान जी का पराक्रम: शक्ति नहीं, सेवा
युद्ध में हनुमान जी की शक्ति अद्भुत थी, पर उससे भी महान थी उनकी सेवा-भावना। वे संकटमोचक बने—जहाँ आवश्यकता, वहाँ समाधान।
कभी संजीवनी का संकल्प, कभी वीरों की रक्षा—हर कदम पर उनका उद्देश्य एक ही था: धर्म की विजय।
रावण की नीति और धर्म की कसौटी
रावण विद्वान था, पर अहंकार ने विवेक ढक लिया। हनुमान जी की कथा हमें सिखाती है कि विद्या तभी सार्थक है, जब वह धर्म के साथ हो।
हनुमान जी कथा में यह प्रसंग बताता है कि शक्ति, वैभव और बुद्धि—यदि धर्म-विहीन हों, तो अंत निश्चित है।
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श्रीराम का नेतृत्व: करुणा और न्याय
राम का नेतृत्व करुणा से भरा था। वे शत्रु को भी अवसर देते हैं, पर अन्याय स्वीकार नहीं करते। हनुमान जी इस नेतृत्व के सच्चे वाहक बने।
रामायण युद्ध कथा में यह संतुलन—करुणा और न्याय—आज के समाज के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है।
धर्म के लिए संघर्ष: आज का संदर्भ
यह कथा केवल त्रेता युग की नहीं। आज भी जब सत्य कठिन लगे, तब हनुमान जी रामायण हमें सिखाती है कि सामूहिक प्रयास, नीति और साहस से हर लंका जीती जा सकती है।
परिवार, समाज या राष्ट्र—हर स्तर पर यह संदेश लागू होता है।
कथा से सीख
धर्म के लिए संघर्ष में संयम सबसे बड़ा शस्त्र है।
नेतृत्व सेवा से महान बनता है।
सामूहिक श्रम असंभव को संभव करता है।
अहंकार विनाश का मार्ग है, विवेक विजय का।
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निष्कर्ष
एपिसोड–14 में राम सेना की लंका पर चढ़ाई हमें सिखाती है कि धर्म केवल उपदेश नहीं, आचरण है। हनुमान जी की शास्त्रोक्त कथा साहस, नीति और भक्ति का जीवंत पाठ है। यही कारण है कि यह कथा आज भी उतनी ही खोजी जाती है, उतनी ही पढ़ी जाती है और उतनी ही प्रेरणा देती है।
