Thursday, February 5, 2026
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अभिलेख और मुद्राओं से इतिहास लेखन होता है प्रमाणिक: डॉ. यशवन्त सिंह राठौर

प्राचीन भारतीय मुद्राओं की निर्माण तकनीक और विकास पर राष्ट्रीय व्याख्यान सम्पन्न

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)।‘‘प्राचीन भारतीय अभिलेख एवं मुद्राएं – अभिरुचि कार्यशाला’’ राष्ट्रीय व्याख्यान श्रृंखला के अंतर्गत प्राचीन इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के डॉ. मणिन्द्र यादव ने ‘‘प्राचीन भारतीय मुद्राओं की निर्माण तकनीक एवं विकास’’ विषय पर व्याख्यान प्रस्तुत किया।
डॉ. मणिन्द्र यादव ने मानव सभ्यता में विनिमय व्यवस्था की शुरुआत पर प्रकाश डालते हुए वस्तु-विनिमय प्रणाली से लेकर धातु मुद्राओं के विकास तक की ऐतिहासिक यात्रा को सरल और रोचक ढंग से प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि समय के साथ आर्थिक आवश्यकताओं के अनुरूप मुद्रा प्रणाली का क्रमिक विकास कैसे हुआ।
व्याख्यान में मौर्यकालीन सिक्कों, उनकी निर्माण तकनीक, धातुओं के चयन, चिह्नों और प्रतीकों के महत्व तथा तत्कालीन आर्थिक व्यवस्था में उनकी भूमिका पर विशेष जोर दिया गया। साथ ही उस दौर की लेन-देन व्यवस्था और राज्य द्वारा मुद्रा नियंत्रण प्रणाली पर भी विस्तार से जानकारी दी गई।
डॉ. मणिन्द्र यादव ने पीपीटी के माध्यम से मुद्रा तकनीक के इतिहास को प्रस्तुत करते हुए प्राचीन सिक्कों से संबंधित चित्र और आकृतियां भी प्रदर्शित कीं, जिससे प्रतिभागियों की जिज्ञासाओं का समाधान हुआ।
कार्यशाला के संयोजक एवं राजकीय बौद्ध संग्रहालय, गोरखपुर के उप निदेशक डॉ. यशवन्त सिंह राठौर ने कहा कि अभिलेखों और मुद्राओं के आधार पर किया गया इतिहास लेखन अत्यंत प्रमाणिक और विश्वसनीय होता है। उन्होंने बताया कि मुद्राओं की निर्माण तकनीक और उनके विकास के विभिन्न चरणों को समझना इतिहास अध्ययन के लिए आवश्यक है।
राष्ट्रीय व्याख्यान श्रृंखला के द्वितीय दिन आयोजित इस सत्र में लगभग 85 प्रतिभागियों के साथ-साथ कार्यालय के कार्मिक भी उपस्थित रहे।

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