द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी 2026: फाल्गुन मास में गणपति व्रत का संपूर्ण महत्व, शुभ मुहूर्त और व्रत कथा
हिंदू धर्म में संकष्टी चतुर्थी व्रत को संकटों से मुक्ति दिलाने वाला अत्यंत फलदायी व्रत माना गया है। यह व्रत प्रत्येक माह कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है और पूर्ण रूप से भगवान गणेश को समर्पित होता है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से गणपति जी की पूजा करने से जीवन के सभी विघ्न-बाधाएं दूर होती हैं और सुख-समृद्धि का आगमन होता है।
फाल्गुन मास में पड़ने वाली संकष्टी चतुर्थी को द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है, जिसका विशेष आध्यात्मिक महत्व है। आइए जानते हैं द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी 2026 की तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और इसकी पौराणिक व्रत कथा विस्तार से।
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी 2026 तिथि
वैदिक पंचांग के अनुसार,
फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि
शुरू – 5 फरवरी 2026, मध्यरात्रि 12:09 बजे
समाप्त – 6 फरवरी 2026, मध्यरात्रि 12:22 बजे
उदयातिथि के आधार पर
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👉 द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी व्रत 5 फरवरी 2026, गुरुवार को रखा जाएगा।
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी 2026 शुभ मुहूर्त
व्रत और पूजा के लिए शुभ समय का विशेष महत्व होता है।
ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 5:22 बजे से 6:15 बजे तक
प्रातःकाल पूजा मुहूर्त: सुबह 7:07 बजे से 8:29 बजे तक
अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:13 बजे से 12:57 बजे तक
यदि किसी कारणवश प्रातः पूजा संभव न हो, तो अभिजीत मुहूर्त में गणपति पूजन करना भी अत्यंत फलदायी माना गया है।
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द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी व्रत का महत्व
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी भगवान गणेश के उस स्वरूप से जुड़ी है जिसमें वे ब्राह्मणों और विद्वानों के प्रिय माने जाते हैं। “द्विज” का अर्थ होता है – ब्राह्मण या वेदों का ज्ञाता। इस दिन गणेश जी की पूजा करने से
मानसिक तनाव दूर होता है
कार्यों में आ रही बाधाएं समाप्त होती हैं
करियर, व्यापार और शिक्षा में सफलता मिलती है
परिवार में सुख-शांति बनी रहती है
विशेष मान्यता है कि इस व्रत में चंद्र दर्शन और अर्घ्य अर्पण करने से जीवन के पुराने कष्ट भी समाप्त हो जाते हैं।
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द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी पूजा विधि
संकष्टी चतुर्थी व्रत की पूजा विधि सरल लेकिन अत्यंत प्रभावशाली मानी गई है।
सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर के मंदिर या पूजा स्थल की सफाई करें।
अब हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें।
एक चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान गणेश की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
इसके बाद क्रमशःसिंदूर,चंदन,अक्षत,पुष्प,दूर्वा,फल,मोदक अर्पित करें। घी का दीपक जलाएं और गणेश मंत्रों का जाप करें। इसके पश्चात संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा का पाठ करें और अंत में भगवान गणेश की आरती करें।
दिनभर फलाहार रखें और रात्रि में चंद्रमा के दर्शन कर उन्हें अर्घ्य अर्पित करने के बाद व्रत का पारण करें।
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द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा (विस्तृत)
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक समय की बात है। एक नगर में एक विद्वान ब्राह्मण परिवार रहता था। वह अत्यंत धर्मपरायण था लेकिन उसके जीवन में लगातार संकट आते रहते थे। धन की कमी, रोग और मानसिक अशांति ने उसके जीवन को दुखमय बना दिया था।
एक दिन एक साधु ने उसे द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी व्रत के बारे में बताया और कहा कि यदि वह श्रद्धा और नियमपूर्वक यह व्रत करेगा, तो भगवान गणेश उसकी सभी समस्याओं को हर लेंगे।
ब्राह्मण ने फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष चतुर्थी को पूरे विधि-विधान से व्रत रखा। दिनभर उपवास किया, रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य दिया और गणपति जी की कथा सुनी। उसी रात उसे स्वप्न में भगवान गणेश के दर्शन हुए। गणपति जी ने कहा—
“हे द्विज! तुम्हारी श्रद्धा से मैं प्रसन्न हूं। अब तुम्हारे जीवन से सभी संकट दूर होंगे।”
कुछ ही समय में ब्राह्मण के जीवन में चमत्कारी परिवर्तन हुआ। रोग दूर हो गए, धन-धान्य की प्राप्ति हुई और उसका जीवन सुखमय हो गया। तभी से यह व्रत संकटों को हरने वाला संकष्टी चतुर्थी व्रत कहलाने लगा।
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चंद्र दर्शन का विशेष महत्व
संकष्टी चतुर्थी व्रत में चंद्र दर्शन को अनिवार्य माना गया है। बिना चंद्र दर्शन के व्रत पूर्ण नहीं माना जाता। चंद्रमा मन और भावनाओं का कारक है। उन्हें अर्घ्य देने से मानसिक शांति और भावनात्मक संतुलन प्राप्त होता है।
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी पर क्या करें, क्या न करें
क्या करें।
गणेश मंत्रों का जाप करें,सात्विक भोजन या फलाहार लें,चंद्रमा को अर्घ्य दें,क्या न करें,तामसिक भोजन से परहेज करें,व्रत के दिन क्रोध और कटु वचन से बचें।
