Thursday, January 15, 2026
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आत्मनिर्भर भारत का सपना और महराजगंज की जमीनी सच्चाई

डॉ. सतीश पाण्डेय

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। आत्मनिर्भर भारत का सपना देश के विकास विमर्श का केंद्र बन चुका है। नीति-निर्माता बार-बार यह दावा कर रहे हैं कि भारत आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। किंतु जब इस राष्ट्रीय लक्ष्य को जनपदों की कसौटी पर कसा जाता है, तो तस्वीर कहीं अधिक जटिल और चिंताजनक दिखाई देती है। महराजगंज जनपद इसकी एक सजीव मिसाल बनकर उभरता है, जहां आत्म-निर्भरता का दावा और जमीनी हकीकत एक-दूसरे से मेल नहीं खाती।महराजगंज आज भी औद्योगिक दृष्टि से लगभग शून्य है। न यहां बड़े उद्योग स्थापित हो सके, न कल-कारखानों का जाल बिछ पाया और न ही स्थायी रोजगार के अवसर सृजित हो सके। परिणामस्वरूप, हर वर्ष हजारों युवा रोजगार की तलाश में दिल्ली, मुंबई, पंजाब और गुजरात जैसे औद्योगिक राज्यों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं। यह पलायन केवल आर्थिक विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक ताने-बाने के टूटने का भी संकेत है।

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जनपद की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि और मनरेगा जैसी सरकारी योजनाओं पर निर्भर है। लेकिन खेती आज मौसम की अनिश्चितता, बढ़ती लागत और सीमित संसाधनों की मार झेल रही है। वहीं मनरेगा, जो ग्रामीण रोजगार की रीढ़ मानी जाती है, समय पर मजदूरी न मिलने के कारण मजदूरों का भरोसा खोती जा रही है। महीनों तक भुगतान न होने से श्रमिकों की हालत दयनीय हो जाती है। ऐसे में आत्मनिर्भरता की अवधारणा यहां नारे से आगे नहीं बढ़ पाती।
युवाओं की पीड़ा सबसे गंभीर है। शिक्षा पूरी करने के बाद उनके सामने स्थानीय स्तर पर कोई ठोस विकल्प नहीं बचता। न आईटी पार्क हैं, न फूड प्रोसेसिंग यूनिट, न ही छोटे-मध्यम उद्योगों को बढ़ावा देने की प्रभावी व्यवस्था। सरकारी योजनाएं और घोषणाएं फाइलों और बैठकों तक सीमित रह जाती हैं, जबकि जमीन पर उनका प्रभाव नगण्य दिखाई देता है।
स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि महराजगंज में कृषि आधारित उद्योग, डेयरी, खाद्य प्रसंस्करण, हथकरघा, बांस व कुटीर उद्योगों को योजनाबद्ध तरीके से बढ़ावा दिया जाए, तो रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं। साथ ही युवाओं को कौशल प्रशिक्षण देकर स्थानीय जरूरतों से जोड़ा जाए, ताकि वे अपने ही जिले में आजीविका कमा सकें। यह मॉडल न केवल पलायन को रोकेगा, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी सशक्त करेगा सवाल आत्मनिर्भर भारत की नीयत पर नहीं, बल्कि उसके क्रियान्वयन पर है। जब तक नीति का लाभ अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंचेगा, तब तक आत्मनिर्भरता का लक्ष्य अधूरा ही रहेगा। महराजगंज जैसे पिछड़े जनपदों को विकास की मुख्यधारा में लाना ही इस अभियान की असली परीक्षा है। आज मूल प्रश्न यह नहीं है कि आत्मनिर्भर भारत का सपना कितना भव्य है, बल्कि यह है कि महराजगंज उस सपने का हिस्सा कब बनेगा। जब तक जिले में ठोस औद्योगिक नीति, स्थायी रोजगार और व्यावहारिक विकास मॉडल लागू नहीं होते, तब तक आत्मनिर्भरता यहां के लोगों के लिए केवल एक आकर्षक नारा बनी रहेगी।

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