Thursday, January 15, 2026
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भारत–नेपाल सांस्कृतिक सेतु के निर्माण में अवधी की भूमिका

नेपाल में अवधी संस्कृति के सशक्त संवाहक: आनन्द गिरि मायालु की प्रेरक यात्रा

प्रस्तुति-चरना गौर

नेपाल की बहुभाषिक पहचान में अवधी भाषा और संस्कृति को नई ऊर्जा देने वाले व्यक्तित्व के रूप में आनन्द गिरि मायालु आज एक सशक्त नाम बन चुके हैं। बीते डेढ़ दशक से वे अवधी भाषा, साहित्य, लोककला और सांस्कृतिक चेतना को जन–जन तक पहुँचाने में निरंतर सक्रिय हैं। उनका कार्य केवल लेखन या मंचीय प्रस्तुति तक सीमित नहीं, बल्कि शिक्षा, मीडिया, महिला सशक्तिकरण और भारत–नेपाल सांस्कृतिक सेतु तक विस्तृत है।
नेपाल के बांके जिले में 14 अक्टूबर 1983 को जन्मे आनन्द गिरि मायालु को अवधी भाषा विरासत में मिली। पारिवारिक संस्कारों और लोकजीवन से जुड़े मूल्यों ने उन्हें बचपन से ही अपनी मिट्टी से जोड़े रखा। समाजशास्त्र में स्नातक शिक्षा ने उनके चिंतन को सामाजिक सरोकारों से जोड़ा। अवधी उनकी मातृभाषा है, वहीं नेपाली, हिंदी और अंग्रेज़ी पर भी उनका प्रभावी अधिकार है—जो उन्हें बहुभाषिक संवाद का स्वाभाविक प्रतिनिधि बनाता है।
रेडियो से लेकर शिक्षा तक अवधी का विस्तार
मायालु ने अवधी को केवल साहित्यिक मंचों तक सीमित नहीं रखा। रेडियो जन आवाज़ एफ.एम. में सात वर्षों तक अवधी कार्यक्रमों का संचालन कर उन्होंने समाचार, संवाद और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से अवधी को जनसंचार की मुख्यधारा से जोड़ा। यह प्रयास अवधी भाषा के इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है।
शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान ऐतिहासिक है। नेपाल सरकार के पाठ्यक्रम विकास केंद्र द्वारा कक्षा 8 की अवधी पाठ्यपुस्तक में उनकी कविता का समावेश, अवधी भाषा को औपचारिक शैक्षणिक मान्यता दिलाने की दिशा में बड़ा कदम है। इसके अतिरिक्त “हमरे पहिचान” नामक अवधी डॉक्यूमेंट्री के सह-निर्देशन के जरिए उन्होंने दृश्य माध्यम से लोकसंस्कृति का दस्तावेजीकरण किया।
साहित्य, संगठन और सामाजिक सशक्तिकरण
आनन्द गिरि मायालु की अब तक हजार से अधिक रचनाएँ—कविता, कहानी और लेख—नेपाली, हिंदी और अवधी में प्रकाशित हो चुकी हैं। अवधी की त्रैमासिक पत्रिकाओं “फुलवारी” और “नवा नेपाल” के संपादन से उन्होंने नए रचनाकारों को मंच और अवधी साहित्य को संस्थागत आधार दिया।
उन्होंने “शब्द प्रतिभा बहुक्षेत्रीय सम्मान फाउंडेशन नेपाल” की स्थापना कर भाषा, कला और संस्कृति के लिए स्थायी संगठन खड़ा किया।
मोटिवेशन स्पीकर और सॉफ्ट स्किल ट्रेनर के रूप में उन्होंने 2500 से अधिक थारू, मुस्लिम और दलित समुदाय की महिलाओं को आत्मनिर्भरता का प्रशिक्षण दिया—जहाँ संस्कृति सीधे सामाजिक बदलाव से जुड़ती दिखती है।
राष्ट्रीय–अंतरराष्ट्रीय पहचान
भारत–नेपाल मैत्री, सांस्कृतिक पर्यटन और अंतरराष्ट्रीय काव्य आयोजनों के माध्यम से उन्होंने अवधी, मिथिला और ब्रज क्षेत्रों को साझा मंच पर जोड़ा। अवधी लोकभाषा रत्न, अवधश्री सम्मान और इंटरनेशनल लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड जैसे अनेक सम्मान उनके बहुआयामी योगदान की पुष्टि करते हैं।
आनन्द गिरि मायालु केवल साहित्यकार नहीं, बल्कि अवधी संस्कृति के आधुनिक युग के कर्मयोगी हैं—जो परंपरा को भविष्य से जोड़ते हुए नेपाल में अवधी संस्कृति का प्रचार एक आंदोलन के रूप में आगे बढ़ा रहे हैं।

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