✍️ इंदरजीत सिंह/संजय पराते
20 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरावली पर्वत श्रृंखला से जुड़े अपने ही फैसले पर रोक लगाए जाने के बाद देशभर में एक अस्थायी राहत की भावना जरूर बनी है, लेकिन इसे अंतिम जीत मान लेना एक बड़ी भूल होगी। इस फैसले के खिलाफ किसानों, महिलाओं, ग्रामीण मजदूरों, आदिवासियों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और नागरिक संगठनों का व्यापक विरोध सामने आया था। विवाद की जड़ वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा पेश की गई वह नई परिभाषा थी, जिसके तहत 100 मीटर से कम ऊंची पहाड़ियों को पहाड़ी न मानते हुए उन्हें खनन से बाहर कर दिया गया था।
जनाक्रोश इतना तीव्र था कि केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की बार-बार दी गई सफाइयाँ और डैमेज कंट्रोल की कोशिशें भी नाकाम रहीं। अंततः सुप्रीम कोर्ट को स्वयं संज्ञान लेते हुए 29 दिसंबर को मामले की तत्काल सुनवाई करनी पड़ी, एक नई समिति गठित करनी पड़ी और अपने फैसले पर रोक लगानी पड़ी। यह सकारात्मक कदम जरूर है, लेकिन संतोष की कोई वजह नहीं है, क्योंकि पुरानी परिभाषा के बावजूद अरावली में दशकों से अवैध खनन बेरोकटोक जारी रहा है।
अरावली पर्वतमाला का महत्व
अरावली दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, जिसकी आयु लगभग 1.5 से 2.5 अरब वर्ष मानी जाती है। गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर के 37 जिलों में फैली यह श्रृंखला केवल पहाड़ों का समूह नहीं, बल्कि उत्तर-पश्चिम भारत की जीवन रेखा है।
करीब 1.44 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली अरावली थार रेगिस्तान के पूर्व की ओर फैलाव को रोकने में प्राकृतिक ढाल का काम करती है। यह मानसून पैटर्न को संतुलित करती है, भूजल पुनर्भरण में सहायक है और जैव विविधता का मजबूत आधार है। यदि अरावली का विनाश जारी रहा, तो जलवायु परिवर्तन, लू, धूल भरी आंधियों और खाद्य संकट जैसी समस्याएँ और गंभीर होंगी।
विडंबना यह है कि दिल्ली की खराब वायु गुणवत्ता के लिए अक्सर किसानों को जिम्मेदार ठहराया जाता है, जबकि अरावली में बड़े पैमाने पर हो रहा अवैध खनन और वनों की कटाई लगभग अनदेखी कर दी जाती है। हरियाणा के सोहना क्षेत्र के सल्फर युक्त गर्म जल स्रोत जैसे कई संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्र आज गंभीर खतरे में हैं।
अरावली का क्रूर विध्वंस
पिछले कई दशकों से संगठित माफिया और कॉर्पोरेट-राजनीतिक गठजोड़ के चलते अरावली में बेरहम खनन और अंधाधुंध पेड़ कटाई होती रही है। पहले स्थानीय स्तर पर सीमित खनन होता था, लेकिन समय के साथ भारी मशीनों, बुलडोज़रों और विस्फोटकों का इस्तेमाल शुरू हो गया।
आज स्थिति यह है कि पहाड़ों के भीतर गहरे विस्फोट किए जाते हैं, जिनसे आसपास के गांवों में भूकंप जैसे झटके महसूस होते हैं। घरों में दरारें पड़ रही हैं और खेती-बाड़ी तबाह हो रही है। दक्षिण हरियाणा के महेंद्रगढ़ और चरखी दादरी जिलों में ग्रामीणों को खनन बंद कराने के लिए पंचायतें और लंबे धरने देने पड़े हैं।
खनन के साथ-साथ रियल एस्टेट कॉर्पोरेट्स की नजरें भी अरावली पर हैं। गुरुग्राम, फरीदाबाद और दिल्ली-एनसीआर के बाहरी इलाकों में फार्महाउस, रिसॉर्ट और बहुमंजिला इमारतों के लिए पहाड़ियों को समतल किया जा रहा है।
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पूंजीवाद का अभिशाप और पर्यावरण संकट
फरवरी 2025 में संसद को दी गई जानकारी के अनुसार, भारत के मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण एटलस 2021 बताता है कि हरियाणा में 3.64 लाख हेक्टेयर, पंजाब में 1.68 लाख और उत्तर प्रदेश में 1.54 लाख हेक्टेयर भूमि पहले ही मरुस्थलीकरण से प्रभावित है। यदि अरावली का दोहन कॉर्पोरेट मुनाफे के लिए जारी रहा, तो यह संकट और गहराएगा।
मार्क्स और एंगेल्स के अनुसार, पूंजीवाद प्रकृति के साथ एक “मेटाबोलिक दरार” पैदा करता है, जहाँ मुनाफे की हवस प्राकृतिक संतुलन को तोड़ देती है। मिट्टी, जंगल और पानी को केवल संसाधन मानने की सोच अंततः मानव समाज को भी विनाश की ओर ले जाती है। अरावली का संकट इसी पूंजीवादी लूट का जीवंत उदाहरण है।
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