Wednesday, January 14, 2026
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इंसानियत की जीत: चंदे से पिता का शव घर लाया बेटा

पिता का शव लाने के लिए बेटे ने मांगा चंदा, गांव ने दिखाई इंसानियत की मिसाल

महराजगंज (राष्ट्र की परंपरा)।गरीबी, बेबसी और संघर्ष के बीच मानवता की एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने हर संवेदनशील मन को झकझोर दिया। पिता का शव लाने के लिए बेटे ने चंदा मांगा और पूरा गांव उसके साथ खड़ा हो गया। यह घटना न सिर्फ एक परिवार के दर्द को दर्शाती है, बल्कि ग्रामीण एकता और सामाजिक सहयोग की मिसाल भी पेश करती है।
महराजगंज जिले के बृजमनगंज थाना क्षेत्र के सौंरहां गांव निवासी पंचम कनौजिया (51) रोजी-रोटी की तलाश में मुंबई गए थे। वह वहां एक कपड़ा फैक्ट्री में काम कर परिवार का पालन-पोषण कर रहे थे। करीब चार महीने पहले घर से निकले पंचम की तबीयत कुछ दिनों से खराब चल रही थी। इलाज के लिए वह मुंबई से अपने गांव लौट रहे थे और कुशीनगर एक्सप्रेस ट्रेन से यात्रा कर रहे थे।

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2 जनवरी की रात जब ट्रेन झांसी रेलवे स्टेशन पहुंची, तब तक पंचम की तबीयत अत्यधिक बिगड़ चुकी थी। रात करीब 8:30 बजे उनकी ट्रेन में ही मौत हो गई। स्टेशन पर मौजूद मेडिकल टीम ने जांच के बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया। देर रात झांसी जीआरपी द्वारा परिवार को सूचना दी गई।
परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि झांसी (करीब 700 किलोमीटर दूर) जाकर शव लाने तक के पैसे नहीं थे। मृतक के साले सर्वेश कुमार ने बताया कि रात में कोई भी झांसी जाने की स्थिति में नहीं था। अगली सुबह पंचम के बेटे प्रदीप ने गांव के प्रधान और ग्रामीणों से मदद की अपील की।
इसके बाद जो हुआ, वह इंसानियत की मिसाल बन गया। गांव के लोगों ने बिना देर किए चंदा इकट्ठा किया और करीब 20 हजार रुपये जुटाए। इसी राशि से 18 हजार रुपये में पिकअप वाहन बुक किया गया, जिससे परिवार के सदस्य झांसी पहुंचे। आवश्यक कागजी कार्रवाई पूरी कर रविवार को पंचम का शव गांव लाया गया।
प्रदीप ने बताया कि पिता ही परिवार की एकमात्र कमाई का जरिया थे। परिवार में दो भाई और एक बहन हैं। आर्थिक तंगी के कारण बड़ी बहन प्रियंका को पढ़ाई छोड़नी पड़ी। प्रदीप 12वीं का छात्र है, जबकि छोटा भाई आदित्य 9वीं में पढ़ता है। बहन की शादी की जिम्मेदारी भी पिता पर ही थी।

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भावुक प्रदीप ने कहा, “अगर गांव वालों ने चंदा न दिया होता, तो हम पिता का शव भी नहीं ला पाते।”
यह घटना एक ओर गरीब परिवारों की कठोर सच्चाई को उजागर करती है, वहीं दूसरी ओर यह दिखाती है कि आज भी गांवों में इंसानियत और सामूहिक सहयोग जिंदा है।

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