कैलाश सिंह
महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। भारतीय सनातन संस्कृति में यज्ञ को केवल धार्मिक कर्मकांड मानना उसकी गहराई को सीमित करना है। वास्तव में यज्ञ जीवन, प्रकृति और ब्रह्मांड के बीच संतुलन स्थापित करने की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। आधुनिक युग में जब हर परंपरा को तर्क और विज्ञान की कसौटी पर परखा जा रहा है, तब यज्ञ की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ जाती है। यज्ञ आस्था, ज्ञान और विज्ञान का ऐसा अद्भुत संगम है, जिसे समझे बिना भारतीय सभ्यता को समझना अधूरा है।
वेदों में यज्ञ का वैज्ञानिक दृष्टिकोण
वेदों में यज्ञ को जीवन का आधार माना गया है। ऋग्वेद से लेकर यजुर्वेद तक, यज्ञ को प्रकृति के नियमों से जोड़कर देखा गया है। यज्ञ का उद्देश्य केवल देव आराधना नहीं, बल्कि पर्यावरण की शुद्धि, मानसिक संतुलन और सामाजिक समरसता है। यही अवधारणा आज के विज्ञान में इकोलॉजिकल बैलेंस और मेंटल वेलबीइंग के रूप में स्वीकार की जा रही है।
यज्ञ और पर्यावरण शुद्धि का विज्ञान
वैज्ञानिक दृष्टि से यज्ञ में प्रयुक्त घी, औषधीय वनस्पतियां और हवन सामग्री दहन के बाद वायुमंडल में ऐसे तत्व छोड़ती हैं, जो वायु शुद्धि में सहायक माने जाते हैं। कई शोध संकेत देते हैं कि यज्ञ से उत्पन्न धुआं कुछ हद तक हानिकारक जीवाणुओं को निष्क्रिय करता है। प्राचीन काल में इसी कारण यज्ञ को महामारी, पर्यावरण असंतुलन और प्राकृतिक आपदाओं से निपटने का एक प्रभावी माध्यम माना गया।
मंत्र, ध्वनि और मानसिक स्वास्थ्य
यज्ञ का एक महत्वपूर्ण पक्ष मंत्र हैं। मंत्र केवल शब्द नहीं, बल्कि ध्वनि-तरंगें हैं। विज्ञान भी मानता है कि ध्वनि का सीधा प्रभाव मन और वातावरण पर पड़ता है। यज्ञ के दौरान उच्चारित मंत्रों की विशेष लय और आवृत्ति मानसिक एकाग्रता बढ़ाने और तनाव कम करने में सहायक होती है। आज योग, मेडिटेशन और साउंड थेरेपी के रूप में जिस विज्ञान को अपनाया जा रहा है, उसकी जड़ें वैदिक मंत्रों और यज्ञ परंपरा में स्पष्ट दिखाई देती हैं।
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सामाजिक समरसता का संदेश
यज्ञ सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका मूल भाव है—“इदं न मम”, अर्थात यह मेरा नहीं है। यज्ञ व्यक्तिगत स्वार्थ के बजाय समष्टि कल्याण की भावना को प्रोत्साहित करता है। उपभोक्तावादी युग में, जहां प्रकृति का अंधाधुंध दोहन हो रहा है, यज्ञ त्याग, संतुलन और सहभागिता का संदेश देता है।
परंपरा और विज्ञान का सेतु
आज आवश्यकता है कि यज्ञ को न तो अंधविश्वास के रूप में देखा जाए और न ही आधुनिक विज्ञान के विरोध में खड़ा किया जाए। यज्ञ को उसके मूल स्वरूप—ज्ञान और विज्ञान के संगम—के रूप में समझना समय की मांग है। जब भारतीय परंपराओं को वैज्ञानिक दृष्टि से समझा जाएगा, तभी भारतीय ज्ञान परंपरा का वास्तविक गौरव पुनः स्थापित होगा।
यज्ञ अतीत की धरोहर मात्र नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा दिखाने वाला प्रकाश है। यह सिखाता है कि आस्था और विज्ञान एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। यही यज्ञ का संदेश है और यही भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी शक्ति।
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