(शिक्षा डेस्क – राष्ट्र की परम्परा)
शिक्षा को किसी भी समाज की प्रगति और समानता की सबसे सशक्त आधारशिला माना जाता है। यही वह माध्यम है, जो व्यक्ति को उसकी सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से ऊपर उठकर आगे बढ़ने का अवसर देता है। लेकिन आज भारत में शिक्षा में असमानता एक ऐसी सच्चाई बन चुकी है, जो लाखों बच्चों के सपनों पर अमीरी-गरीबी की भारी दीवार खड़ी कर रही है। सवाल यह नहीं कि शिक्षा उपलब्ध है या नहीं, सवाल यह है कि क्या गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हर बच्चे तक समान रूप से पहुंच पा रही है?
अमीर और गरीब की दो अलग दुनिया
आज देश की शिक्षा व्यवस्था दो स्पष्ट हिस्सों में बंटी दिखाई देती है। एक तरफ शहरों के महंगे निजी स्कूल, इंटरनेशनल बोर्ड, स्मार्ट क्लासरूम, एआई आधारित लर्निंग और महंगी कोचिंग सुविधाओं से लैस बच्चे हैं। दूसरी ओर सरकारी स्कूलों और दूरदराज़ के ग्रामीण क्षेत्रों में पढ़ने वाले वे छात्र हैं, जिनके लिए आज भी शिक्षक की नियमित उपस्थिति, साफ कक्षाएं और पाठ्यपुस्तकें एक चुनौती बनी हुई हैं।
शिक्षा में असमानता केवल संसाधनों की नहीं, बल्कि अवसरों की भी असमानता है। जहां संपन्न वर्ग का बच्चा बचपन से प्रतियोगी माहौल में ढल जाता है, वहीं गरीब तबके का छात्र बुनियादी सुविधाओं के अभाव में संघर्ष करता रहता है।
कोरोना काल ने बढ़ाई खाई
कोरोना महामारी ने इस असमानता को और गहरा कर दिया। ऑनलाइन शिक्षा ने जहां आर्थिक रूप से सक्षम परिवारों के बच्चों को निरंतर पढ़ाई से जोड़े रखा, वहीं डिजिटल संसाधनों के अभाव में लाखों गरीब छात्र शिक्षा व्यवस्था से बाहर हो गए। स्मार्टफोन, इंटरनेट कनेक्शन और घर में पढ़ने के अनुकूल वातावरण की कमी ने उन्हें पीछे धकेल दिया।
कई क्षेत्रों में बच्चों को मजबूरी में मजदूरी, घरेलू काम या पारिवारिक जिम्मेदारियां संभालनी पड़ीं। यह स्थिति स्पष्ट रूप से दिखाती है कि डिजिटल डिवाइड भी शिक्षा में असमानता का एक बड़ा कारण बन चुका है।
प्रतियोगी परीक्षाएं और कोचिंग संस्कृति
आज सफलता का पैमाना बन चुकी प्रतियोगी परीक्षाएं भी इस असमानता को बढ़ावा दे रही हैं। महंगी कोचिंग, टेस्ट सीरीज़, पर्सनल मेंटरशिप और ऑनलाइन कोर्स केवल उन्हीं छात्रों की पहुंच में हैं, जो भारी फीस चुका सकते हैं।
प्रतिभा और मेहनत के बावजूद गरीब और ग्रामीण छात्र इस दौड़ में पिछड़ जाते हैं। शिक्षा में असमानता का सबसे खतरनाक रूप यही है, जब योग्यता से अधिक आर्थिक स्थिति सफलता का निर्धारक बन जाए।
सरकारी योजनाएं: प्रयास लेकिन पर्याप्त नहीं
सरकार ने शिक्षा में समानता लाने के लिए छात्रवृत्ति, मध्याह्न भोजन योजना, मुफ्त किताबें, यूनिफॉर्म और डिजिटल शिक्षा जैसे कई कदम उठाए हैं। इन योजनाओं से स्कूलों में नामांकन बढ़ा है, लेकिन गुणवत्ता का सवाल अब भी बना हुआ है।
शिक्षकों की कमी, प्रशिक्षण का अभाव, निगरानी तंत्र की कमजोरी और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप पाठ्यक्रम का न होना—ये सभी कारण सरकारी प्रयासों के प्रभाव को सीमित कर देते हैं। जब तक शिक्षा की गुणवत्ता में समान सुधार नहीं होगा, तब तक शिक्षा में असमानता खत्म नहीं हो सकती।
समाधान की दिशा
इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए केवल नीतियों की घोषणा नहीं, बल्कि ठोस क्रियान्वयन की जरूरत है।
सरकारी स्कूलों में आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर और डिजिटल संसाधनों का विस्तार
ग्रामीण और गरीब छात्रों के लिए मुफ्त या कम लागत की कोचिंग व्यवस्था
स्थानीय भाषा में गुणवत्तापूर्ण ई-लर्निंग कंटेंट
शिक्षकों की समयबद्ध नियुक्ति और निरंतर प्रशिक्षण
शिक्षा को कौशल और रोजगार से जोड़ने वाली व्यावहारिक नीति
इन कदमों से ही शिक्षा को वास्तव में समान अवसर का माध्यम बनाया जा सकता है।
निष्कर्ष
यदि शिक्षा में असमानता इसी तरह बढ़ती रही, तो इसका सीधा असर सामाजिक असंतुलन, बेरोजगारी और आर्थिक विषमता पर पड़ेगा। शिक्षा को बाजार की वस्तु बनने से बचाकर उसे सामाजिक न्याय का औजार बनाना समय की मांग है।
हर बच्चे का सपना उसकी जेब से नहीं, उसकी क्षमता से तय होना चाहिए। जब तक यह सिद्धांत जमीन पर लागू नहीं होगा, तब तक विकसित और समावेशी भारत का सपना अधूरा रहेगा।
शिक्षा में असमानता: सपनों पर भारी होती अमीरी-गरीबी की खाई
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