Tuesday, February 3, 2026
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पैसे देकर मिलने वाला सम्मान: शिक्षा की आत्मा पर हमला

शिक्षा पुरस्कार घोटाला: अब चुप नहीं रहेंगे शिक्षक, सम्मान के नाम पर हो रहा संगठित व्यापार

पटना (राष्ट्र की परम्परा) शिक्षा को किसी भी सभ्य समाज की नैतिक रीढ़ माना जाता है। यहीं से ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और सामाजिक मूल्यों की नींव पड़ती है। लेकिन हाल के वर्षों में शिक्षा जगत से जुड़ा एक गंभीर और चिंताजनक सच सामने आया है, जिसे अब “शिक्षा पुरस्कार घोटाला” कहा जा रहा है। सम्मान और उपलब्धि के नाम पर शिक्षकों से पैसे वसूलने की यह प्रवृत्ति न केवल शिक्षकों की गरिमा को ठेस पहुँचाती है, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है।
कैसे रचा जा रहा है शिक्षा पुरस्कार घोटाले का जाल
देश के विभिन्न राज्यों में सक्रिय कई तथाकथित शैक्षिक संगठन, फाउंडेशन और निजी अवार्ड कमेटियाँ शिक्षकों को फोन कॉल, व्हाट्सएप मैसेज या ई-मेल के माध्यम से संपर्क करती हैं। उन्हें यह बताया जाता है कि उनके कार्य को “राष्ट्रीय” या “अंतरराष्ट्रीय स्तर” पर सराहा गया है और वे किसी बड़े पुरस्कार के लिए चयनित हुए हैं। शुरुआती संवाद इतना सम्मानजनक होता है कि शिक्षक स्वयं को गौरवान्वित महसूस करता है।

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लेकिन इसके बाद असली खेल शुरू होता है। पुरस्कार समारोह में शामिल होने के लिए रजिस्ट्रेशन शुल्क, प्रोसेसिंग चार्ज, सेरेमनी फीस, गेस्ट मैनेजमेंट या डॉक्यूमेंटेशन कॉस्ट जैसे कई नामों से मोटी रकम माँगी जाती है। कई मामलों में यह राशि हजारों से लेकर लाखों रुपये तक पहुँच जाती है।
सम्मान नहीं, अब सौदा बन चुका है पुरस्कार
शिक्षाविदों का मानना है कि जहाँ सम्मान पाने के लिए भुगतान अनिवार्य हो, वहाँ योग्यता और निष्पक्षता का कोई स्थान नहीं बचता। सच्चा सम्मान वह होता है, जो बिना किसी शर्त और शुल्क के दिया जाए। यदि पुरस्कार के लिए पैसे देने पड़ें, तो वह सम्मान नहीं बल्कि एक व्यावसायिक सौदा बन जाता है।
इस प्रक्रिया में शिक्षक सम्मानित नहीं, बल्कि ग्राहक बन जाता है और शिक्षा एक बाजार में तब्दील हो जाती है। यह स्थिति समाज को यह गलत संदेश देती है कि उपलब्धियाँ खरीदी जा सकती हैं और पहचान पैसे से मिलती है।

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शिक्षक समुदाय पर गहरा मानसिक और सामाजिक प्रभाव
इस शिक्षा पुरस्कार घोटाले का सबसे खतरनाक असर शिक्षकों की मानसिक स्थिति और सामाजिक प्रतिष्ठा पर पड़ रहा है। कई शिक्षक सामाजिक दबाव और “सम्मान छूट जाने” के डर से भुगतान करने को मजबूर हो जाते हैं। बाद में उन्हें यह एहसास होता है कि वे एक योजनाबद्ध शोषण का शिकार बने हैं।
धीरे-धीरे समाज में यह धारणा बनने लगती है कि पुरस्कार वास्तविक उपलब्धियों का प्रमाण नहीं, बल्कि आर्थिक सामर्थ्य का परिणाम हैं। इससे ईमानदारी से कार्य करने वाले शिक्षकों का मनोबल टूटता है।
टीचर्स ऑफ बिहार ने खोला मोर्चा
इसी पृष्ठभूमि में टीचर्स ऑफ बिहार संगठन ने शिक्षा पुरस्कार घोटाले के खिलाफ खुलकर आवाज़ बुलंद की है। संगठन के फाउंडर शिव कुमार और टेक्निकल टीम लीडर ई. शिवेंद्र प्रकाश सुमन ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में सम्मान को व्यापार बनाना शिक्षकों का ही नहीं, पूरे समाज का अपमान है।

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संगठन के प्रदेश प्रवक्ता रंजेश कुमार और प्रदेश मीडिया संयोजक मृत्युंजय कुमार ने संयुक्त बयान जारी कर ऐसे फर्जी और सशुल्क पुरस्कार आयोजनों पर तत्काल रोक लगाने की माँग की। उन्होंने शिक्षकों से अपील की कि किसी भी ऐसे पुरस्कार को स्वीकार न करें, जिसमें किसी भी प्रकार का शुल्क लिया जाए।
चमक-दमक के पीछे छिपा शोषण
भव्य मंच, बड़े-बड़े बैनर, आकर्षक ट्रॉफियाँ और सोशल मीडिया प्रचार के जरिए इन आयोजनों को प्रतिष्ठित दिखाया जाता है। लेकिन इस चमक-दमक के पीछे शिक्षक का आर्थिक और मानसिक शोषण छिपा होता है।
टीचर्स ऑफ बिहार ने साफ संदेश दिया है—
“अगर सम्मान देना है, तो बिना पैसे दीजिए;
अगर पैसे लेने हैं, तो उसे सम्मान मत कहिए।”
सोशल मीडिया पर भी तेज हो रहा विरोध
इस मुद्दे को जन-जन तक पहुँचाने के लिए संगठन ने सोशल मीडिया पर No Paid Awards अभियान को तेज किया है। शिक्षक, अभिभावक और शिक्षाविद इस अभियान के माध्यम से शिक्षा पुरस्कार घोटाले के खिलाफ एकजुट हो रहे हैं।
सच्चा सम्मान वही है जो गरिमा बढ़ाए
विशेषज्ञों का मानना है कि सच्चा पुरस्कार वही होता है, जो शिक्षक के कार्य, समर्पण और योगदान की गरिमा बढ़ाए, न कि उसकी जेब पर बोझ डाले। जब तक समाज और शिक्षक वर्ग इस अंतर को स्पष्ट रूप से नहीं समझेगा, तब तक शिक्षा के क्षेत्र में ऐसे संगठित घोटाले पनपते रहेंगे।
अब समय आ गया है कि शिक्षक चुप्पी तोड़ें, संगठित हों और शिक्षा पुरस्कार घोटाले के खिलाफ निर्णायक संघर्ष करें, ताकि सम्मान फिर से सम्मान ही रहे, व्यापार न बने।

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