इतिहास के पन्नों में 27 दिसंबर: वे अमर नाम, जिनका निधन बन गया युग का मौन अध्याय
इतिहास केवल तिथियों का संग्रह नहीं होता, बल्कि उन व्यक्तित्वों की स्मृति भी होता है जिन्होंने अपने कर्म, विचार और प्रतिभा से समाज को दिशा दी। 27 दिसंबर ऐसी ही एक तारीख है, जब भारत ने कला, संस्कृति, सिनेमा और राजनीति के तीन महान स्तंभों को खोया। आइए, इन विभूतियों के जीवन, जन्मस्थल और राष्ट्रहित में उनके योगदान को स्मरण करें।
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सुनील कोठारी (निधन: 27 दिसंबर 2020)
सुनील कोठारी भारत के सबसे प्रतिष्ठित नृत्य इतिहासकार, आलोचक और विद्वान थे। उनका जन्म महाराष्ट्र राज्य, भारत में हुआ। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन भारतीय शास्त्रीय नृत्य—विशेषकर कथक, भरतनाट्यम, ओडिसी और मणिपुरी—के संरक्षण और प्रचार को समर्पित कर दिया।सुनील कोठारी केवल आलोचक नहीं थे, बल्कि वे नृत्य को समाज से जोड़ने वाले सेतु थे। उन्होंने अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में लेखन किया और कई महत्वपूर्ण पुस्तकों के माध्यम से भारतीय नृत्य परंपरा को वैश्विक पहचान दिलाई। पद्म श्री और पद्म भूषण जैसे सम्मानों से अलंकृत कोठारी जी ने युवा कलाकारों को मार्गदर्शन देकर सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाया। उनका निधन भारतीय कला जगत के लिए अपूरणीय क्षति रहा।
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फ़ारुख़ शेख़ (निधन: 27 दिसंबर 2013)
फ़ारुख़ शेख़ हिंदी सिनेमा के उन अभिनेताओं में से थे, जिन्होंने संवेदनशील और यथार्थवादी अभिनय से दर्शकों के दिलों में स्थायी स्थान बनाया। उनका जन्म वडोदरा, गुजरात, भारत में हुआ।
उन्होंने ‘चश्मे बद्दूर’, ‘साथ-साथ’, ‘उमराव जान’ और ‘ये जवानी है दीवानी’ जैसी फिल्मों में अपने सहज अभिनय से अलग पहचान बनाई। फ़ारुख़ शेख़ ने मुख्यधारा सिनेमा के साथ-साथ समानांतर सिनेमा को भी मजबूती दी। अभिनय के अतिरिक्त उन्होंने दूरदर्शन पर चर्चित कार्यक्रम ‘जीना इसी का नाम है’ का संचालन कर सामाजिक संवाद को नई दिशा दी। उनका योगदान भारतीय सिनेमा को संवेदनशीलता और गरिमा प्रदान करने में अमूल्य रहा।
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मैरेम्बम कोइरंग सिंह (निधन: 27 दिसंबर 1994)
मैरेम्बम कोइरंग सिंह का नाम मणिपुर के राजनीतिक इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। उनका जन्म मणिपुर राज्य, भारत में हुआ और वे राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री बने।
कोइरंग सिंह ने स्वतंत्रता के बाद मणिपुर को प्रशासनिक स्थिरता देने में निर्णायक भूमिका निभाई। उन्होंने लोकतांत्रिक संस्थाओं की नींव मजबूत की और सामाजिक समरसता को बढ़ावा दिया। सीमांत राज्य होने के कारण मणिपुर के समक्ष अनेक चुनौतियाँ थीं, जिनका उन्होंने दूरदर्शिता से सामना किया। उनका नेतृत्व मणिपुर के भारत में पूर्ण एकीकरण की दिशा में मील का पत्थर साबित हुआ। उनका निधन पूर्वोत्तर भारत की राजनीति के लिए एक युगांतकारी क्षण था।
