डॉ सतीश पाण्डेय
महराजगंज(राष्ट्र की परम्परा)। भारत लगातार बदलाव के दौर से गुजर रहा है, और इसी बदलाव के बीच सबसे बड़ा सवाल उभर कर सामने आया है—आने वाली पीढ़ी के लिए देश का कल कैसा होगा? क्या हम वह भारत बना पाएंगे जिसका सपना करोड़ों युवा और सामान्य नागरिक आज देख रहे हैं? या फिर चुनौतियों का बोझ भविष्य की राह को और कठिन बना देगा?
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तेजी से बढ़ती तकनीक, बदलती अर्थव्यवस्था, और विकास के बदलते मापदंडों ने भारत को एक नये मोड़ पर खड़ा कर दिया है। डिजिटइंडिया, मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया जैसी पहलें भले ही बड़ी उम्मीदें जगाती हैं, लेकिन जमीन पर मौजूद खामियां सपना और हकीकत के बीच की दूरी को भी उजागर करती हैं। शिक्षा प्रणाली में सुधार, तकनीकी उन्नति और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बीच युवाओं पर अपेक्षाओं का दबाव बढ़ा है। देश की आकांक्षाएं युवाओं की प्रतिभा पर टिकी हैं, पर सवाल यह भी है कि क्या उन्हें वह अवसर मिल रहा है जिसके वे हकदार हैं? रोजगार, स्वास्थ्य सुविधाएं, पर्यावरणीय संतुलन और ग्रामीण विकास ऐसे मुद्दे हैं जो भविष्य की तस्वीर को या तो उज्ज्वल बनाएंगे या धुंधला।
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विशेषज्ञों का कहना है कि सपनों का भारत तभी साकार होगा जब विकास सिर्फ शहरों की चमक तक सीमित न रह जाए, बल्कि गांव की गलियों तक भी पहुंचे।आजादी का अमृतकाल चल रहा है, लेकिन असली अमृत वही होगा जब देश की नीति और नीयत दोनों पारदर्शी हों। आने वाली पीढ़ी ऐसे भारत की उम्मीद रखती है जहां अवसर समान हों, तंत्र जवाबदेह हो और जीवन सुरक्षित हो।देश का कल वैसा ही होगा जैसा हम आज तैयार करेंगे। इसलिए जरूरी है कि योजनाएं सिर्फ फाइलों में न अटकी रहें, बल्कि धरातल पर उतर कर आने वाली पीढ़ी के सपनों को वास्तविकता देने का काम करें।
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और इसीलिए सबसे बड़ा सवाल उठता है।क्या हम वह सपनों का भारत बना पाएंगे जिसकी उम्मीद आने वाली पीढ़ी हमसे कर रही है?
