देवरिया (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। पकड़ी बाजार से करीब 3 किलोमीटर पहले यदुपरसिया पेट्रोल पंप से 700 मीटर की दूरी पर स्थित ठाकुरदेवा लिंक रोड पिछले 15 वर्षों से बदहाली की मार झेल रही है। यह सड़क अब गड्ढों में तब्दील हो चुकी है, जिससे राहगीरों, स्कूली बच्चों, किसानों और वाहनों को भारी परेशानी उठानी पड़ रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि लोक निर्माण विभाग (PWD) के अधिकारी वर्षों से इस सड़क की मरम्मत के नाम पर केवल कागजों में काम दिखा रहे हैं। जमीन पर स्थिति बेहद भयावह है—सड़क की तीसरी परत तक उखड़ चुकी है, डामर गायब हो गया है और जगह-जगह बड़े गड्ढे बन गए हैं। बरसात में यह सड़क कीचड़ के तालाब में बदल जाती है।
15 साल से बिना मरम्मत — आखिर जिम्मेदार कौन?
स्थानीय सूत्रों के अनुसार, इस सड़क की मरम्मत का कार्य विगत 15 वर्षों से नहीं हुआ है, जबकि ग्रामीण सड़कों का “नवीनीकरण (Renewal)” हर 5 वर्ष में किया जाना चाहिए। यह नियम लोक निर्माण विभाग के मानक विनिर्देश (PWD Manual) में स्पष्ट रूप से दर्ज है। यानी अब तक इस सड़क का तीन बार नवीनीकरण होना चाहिए था, लेकिन विभाग की लापरवाही और भ्रष्टाचार ने इसे पूरी तरह बर्बाद कर दिया।
फर्जी भुगतान और मिलीभगत का खेल!
ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि विभागीय अधिकारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत से दो बार फर्जी भुगतान तक किया गया है। जबकि सड़क पर एक इंच का भी नया काम नहीं हुआ। अधिशासी अभियंता (Executive Engineer), सहायक अभियंता (AE) और अवर अभियंता (JE) तीनों स्तरों पर जवाबदेही तय नहीं हुई।
सूत्र बताते हैं कि “ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने के लिए अधिकारियों ने फर्जी माप पुस्तिकाओं (Measurement Books) में काम दिखाकर भुगतान किया गया।” लेकिन जब ग्रामीणों ने इसकी शिकायत की, तो उनकी बात अनसुनी कर दी गई।
ग्रामीणों का रोष—‘अब नहीं सहेंगे अन्याय’
ठाकुरदेवा, पकड़ी और यदुपरसिया गांव के लोगों ने चेतावनी दी है कि यदि सड़क की मरम्मत जल्द शुरू नहीं की गई, तो वे लोक निर्माण विभाग के कार्यालय का घेराव करेंगे। ग्रामीणों ने कहा कि “अधिकारियों की नजर केवल कागजी लाभ पर है, जमीनी सच्चाई पर नहीं।”
सवाल उठता है – आखिर कब बनेगी सड़क?
ग्रामीण सड़कें विकास की रीढ़ कही जाती हैं, लेकिन देवरिया-पकड़ी मार्ग की यह लिंक रोड आज भ्रष्टाचार की जकड़ में कराह रही है।
15 साल से जनता सिर्फ झूठे आश्वासन सुन रही है। अगर अब भी जांच कर कार्रवाई नहीं हुई, तो यह एक और उदाहरण बन जाएगा कि कैसे विकास योजनाएं अधिकारियों की जेबों में सिमट जाती हैं।
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