Thursday, January 15, 2026
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UP News: आलू और केले के छिलके अब कचरा नहीं, सेहत सुधारने वाला ‘रेसिस्टेंट स्टार्च’ बनाएंगे लविवि के वैज्ञानिक

लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। लखनऊ विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने एक अनोखा शोध कर दिखाया है। अब आलू और केले के छिलके, चावल की भूसी और कृषि अपशिष्ट जैसी बेकार चीजें कचरा नहीं रहेंगी, बल्कि इनसे बनने वाला रेसिस्टेंट स्टार्च (Resistant Starch) लोगों की सेहत सुधारने में मदद करेगा।

वनस्पति विज्ञान विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. प्रदीप कुमार ने इस अभिनव तकनीक को विकसित किया है, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली है। उनका यह शोध प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल Bioresource Technology में प्रकाशित हुआ है।

खाद्य अपशिष्ट से सेहतमंद उत्पाद

डॉ. प्रदीप के अनुसार, उनकी टीम ने एंजाइम तकनीक, अल्ट्रासाउंड विधि और थर्मल प्रोसेसिंग जैसी पर्यावरण अनुकूल (ग्रीन टेक्नोलॉजी) विधियों का प्रयोग कर एक ऐसा रेसिस्टेंट स्टार्च तैयार किया है जो:

ब्लड शुगर को नियंत्रित करता है,

पाचन तंत्र को मजबूत बनाता है,

और लंबे समय तक भूख न लगने में मदद करता है।

उन्होंने बताया कि यह तकनीक सरल, सस्ती और टिकाऊ है, जबकि वर्तमान में उपलब्ध विधियां महंगी और जटिल हैं।

क्या है रेसिस्टेंट स्टार्च?

रेसिस्टेंट स्टार्च (Resistant Starch) एक विशेष प्रकार का कार्बोहाइड्रेट होता है जो छोटी आंत में नहीं पचता और सीधे बड़ी आंत में पहुंचता है। वहां यह गुड बैक्टीरिया (लाभकारी जीवाणुओं) के लिए भोजन का काम करता है।
इसके फायदे:

ब्लड शुगर नियंत्रण, इंसुलिन सेंसिटिविटी में सुधार, आंत और पाचन स्वास्थ्य बेहतर बनाना

आलू, कच्चे केले, फलियां, और ओट्स जैसे खाद्य पदार्थों में स्वाभाविक रूप से रेसिस्टेंट स्टार्च पाया जाता है।

डॉ. प्रदीप कुमार के शोध को मिली अंतरराष्ट्रीय पहचान

डॉ. प्रदीप ने कहा कि यह शोध न केवल स्वास्थ्य लाभ के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण और खाद्य अपशिष्ट प्रबंधन के लिए भी उपयोगी है।
उनके मुताबिक, यदि इस विधि का औद्योगिक स्तर पर उपयोग किया जाए तो कृषि अपशिष्ट से हेल्दी फूड प्रोडक्ट्स तैयार किए जा सकते हैं।

लविवि प्रवक्ता ने क्या कहा

लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रवक्ता डॉ. मुकुल श्रीवास्तव ने बताया कि यह शोध एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। उन्होंने कहा,

“यदि खाद्य अपशिष्ट का सही तरीके से उपयोग किया जाए, तो इससे न केवल पर्यावरण की रक्षा होगी बल्कि स्वास्थ्यवर्धक उत्पादों का निर्माण भी संभव है।”

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