Friday, February 20, 2026
HomeUncategorizedराधाष्टमी : प्रेम और भक्ति का दिव्य पर्व

राधाष्टमी : प्रेम और भक्ति का दिव्य पर्व

भाद्रपद शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को भारतीय संस्कृति में एक विशेष स्थान प्राप्त है। इस दिन को राधाष्टमी के रूप में मनाया जाता है, जो श्रीराधा रानी के प्राकट्य दिवस के रूप में श्रद्धा और भक्ति का महापर्व माना जाता है। यह पर्व केवल एक पावन जन्मोत्सव भर नहीं है, बल्कि प्रेम, भक्ति, शक्ति और समर्पण की पराकाष्ठा का प्रतीक है।

राधा रानी का महत्व

राधा रानी को श्रीकृष्ण की आंतरिक शक्ति, प्रेम और माधुर्य की आत्मा माना जाता है। श्रीकृष्ण के जीवन, उनकी लीलाओं और उनके माधुर्य को यदि आत्मा मिली, तो वह राधा के कारण ही संभव हुआ। यही कारण है कि भक्ति परंपरा में कहा गया है –
“राधे बिनु नहीं कृष्ण, कृष्ण बिनु नहीं राधे।”

राधा रानी केवल भक्ति की देवी नहीं, बल्कि प्रेम की उस पराकाष्ठा का प्रतीक हैं जो सांसारिक सीमाओं से ऊपर उठकर पूर्णतः आध्यात्मिक हो जाती है।

राधाष्टमी का पर्व और परंपराएँ

इस दिन भक्तजन व्रत-उपवास रखते हैं, विशेष पूजा-अर्चना करते हैं और राधा-कृष्ण की झांकी सजाते हैं। ब्रजभूमि—विशेषकर बरसाना—में राधाष्टमी का आयोजन भव्य रूप से किया जाता है। हजारों भक्त वहां उमड़ते हैं और झूला उत्सव, कीर्तन, रासलीला और भक्ति संकीर्तन के माध्यम से राधा-कृष्ण का स्मरण करते हैं।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संदेश

राधाष्टमी केवल उत्सव का अवसर नहीं है, बल्कि यह हमें यह स्मरण कराती है कि भक्ति बिना प्रेम अधूरी है और प्रेम बिना समर्पण निष्फल। राधा जी का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि जब भक्ति में समर्पण और शुद्ध प्रेम जुड़ता है, तभी वह परमात्मा तक पहुंचने का मार्ग बनता है।
राधाष्टमी भारतीय आध्यात्मिकता का ऐसा पर्व है जिसमें भक्ति, प्रेम और शक्ति का अद्वितीय संगम दिखाई देता है। राधा रानी का दिव्य प्रेम और कृष्ण के साथ उनका अलौकिक मिलन मानवता के लिए यह संदेश देता है कि ईश्वर को पाने का मार्ग केवल सच्ची भक्ति और निस्वार्थ प्रेम है।

RELATED ARTICLES
- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments