
जयंती पर विशेष ✍️ नवनीत मिश्र
संत कबीर नगर (राष्ट्र की परम्परा)। उर्दू साहित्य जगत में फ़िराक़ गोरखपुरी का नाम अदब और शायरी की बुलंदियों का प्रतीक है। उनका असली नाम रघुपति सहाय था और जन्म उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में हुआ। शिक्षा के दिनों से ही उनमें साहित्य और शायरी के प्रति गहरी रुचि विकसित हो गई थी। गोरखपुर की धरती ने उन्हें जन्म दिया और उन्होंने अपनी रचनात्मक प्रतिभा से इस माटी का नाम संपूर्ण भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में रोशन किया।
फ़िराक़ गोरखपुरी ने उर्दू को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। उनकी रचनाओं में परंपरा और आधुनिकता का अनोखा संगम दिखाई देता है। उनकी ग़ज़लें और नज़्में केवल प्रेम और हुस्न तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि समाज, जीवन की जटिलताओं और मानवीय रिश्तों का भी संवेदनशील चित्रण करती हैं। उनकी शायरी का भावनात्मक पक्ष पाठकों को भीतर तक प्रभावित करता है। उनके शेर “मैं हूँ, दिल है, तन्हाई है, तुम भी होते अच्छा होता” जैसे भाव आज भी मोहब्बत और जुदाई की गहराइयों को छू जाते हैं।
फ़िराक़ गोरखपुरी को उनकी साहित्यिक प्रतिभा और योगदान के लिए पद्म भूषण, साहित्य अकादमी पुरस्कार और ज्ञानपीठ पुरस्कार जैसे सर्वोच्च सम्मानों से अलंकृत किया गया। यह सम्मान केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं थे, बल्कि उर्दू अदब की व्यापकता और गरिमा का प्रमाण भी बने। उनकी लेखनी ने ग़ज़ल को महज़ गुनगुनाने की चीज़ नहीं रहने दिया, बल्कि उसे विचार और संवेदनाओं का गहरा दस्तावेज़ बना दिया।
उनकी शायरी का प्रभाव केवल उनके समकालीनों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरित करता रहा। उनकी रचनाओं में इंसान की तन्हाई, मोहब्बत की मिठास, रिश्तों की सच्चाई और समाज की विडंबनाएँ सभी जीवंत रूप में सामने आती हैं। वे मानते थे कि शायरी केवल अल्फ़ाज़ का खेल नहीं, बल्कि दिल और समाज की धड़कन है।
आज भी फ़िराक़ गोरखपुरी की शायरी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी उनके समय में थी। उनकी पंक्तियाँ वर्तमान समाज की चुनौतियों और जीवन की सच्चाइयों को उतनी ही गहराई से बयान करती हैं। वे उर्दू साहित्य के ऐसे सितारे हैं जिनकी चमक कभी कम नहीं होगी। उनका साहित्य आने वाली सदियों तक पाठकों और शोधकर्ताओं को प्रेरित करता रहेगा।
फ़िराक़ गोरखपुरी को याद करते हुए यही कहा जा सकता है कि वे केवल एक शायर नहीं बल्कि साहित्य के ध्रुवतारा थे, जिनकी रोशनी सदा मार्गदर्शन करती रहेगी। वास्तव में फ़िराक़ जैसे शायर बार-बार पैदा नहीं होते।