नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश यशवंत वर्मा द्वारा दायर एक अहम याचिका पर सुनवाई शुरू की, जिसमें उन्होंने अपने आधिकारिक आवास पर अधजली नकदी मिलने के मामले में हुई आंतरिक न्यायिक जांच के निष्कर्षों को चुनौती दी है। जांच में उन्हें कदाचार का दोषी ठहराया गया था।

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ए.जी. मसीह की दो-न्यायाधीशीय पीठ ने मामले की प्रारंभिक सुनवाई करते हुए याचिका की रूपरेखा और न्यायिक आचरण के मानकों पर तीखे सवाल उठाए। पीठ ने यह स्पष्ट किया कि न्यायपालिका की मर्यादा और पारदर्शिता सर्वोपरि है, और यदि कोई न्यायाधीश संदेह के घेरे में आता है, तो उस पर निष्पक्ष रूप से विचार आवश्यक है।
यह मामला 14-15 मार्च 2024 की उस घटना से जुड़ा है जब दिल्ली पुलिस को एक गुप्त सूचना के आधार पर न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के सरकारी बंगले से अधजली नकदी बरामद हुई थी। इसके बाद, भारत के सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर एक आंतरिक न्यायिक जांच समिति गठित की गई थी। इस समिति ने न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ कदाचार का आरोप सिद्ध किया था।

याचिका में कहा गया है कि जांच समिति की प्रक्रिया एकतरफा, अपारदर्शी और पूर्वाग्रही थी तथा तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना द्वारा न्यायमूर्ति वर्मा को पद से हटाने की सिफारिश न्यायसंगत प्रक्रिया का उल्लंघन है। न्यायमूर्ति वर्मा ने यह भी तर्क दिया कि यह कार्रवाई न्यायपालिका की स्वतंत्रता को प्रभावित करती है और उनके न्यायिक स्वाभिमान को ठेस पहुंचाई गई है।
याचिका में आंतरिक जांच समिति के रिपोर्ट और निष्कर्ष को रद्द करने की मांग की गई है।

न्यायमूर्ति वर्मा ने अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों को झूठा और राजनीतिक प्रेरित बताया है।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने मामले को गंभीरता से लिया और कहा कि न्यायिक संस्थानों की गौरव और निष्पक्षता अक्षुण्ण रहनी चाहिए।

⏭️ सुनवाई:

कोर्ट ने केंद्र और संबंधित पक्षों को दो सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 11 अगस्त 2025 को निर्धारित की गई है।