भारत और यूरोपीय संघ के बीच संपन्न ऐतिहासिक भारत-यूरोपीय संघ महाडील केवल एक मुक्त व्यापार समझौता (FTA) नहीं है, बल्कि यह 21वीं सदी की बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की रणनीतिक सोच, आर्थिक आत्मविश्वास और परिपक्व कूटनीति का स्पष्ट प्रमाण है। प्रधानमंत्री द्वारा इसे “मदर ऑफ ऑल डील” कहा जाना इसके दूरगामी प्रभाव और वैश्विक महत्व को रेखांकित करता है।
27 जनवरी को आयोजित 16वें भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन में मुक्त व्यापार समझौते की औपचारिक घोषणा के साथ-साथ सुरक्षा और रक्षा सहयोग से जुड़े अहम समझौतों पर सहमति बनी। इससे यह स्पष्ट हो गया कि भारत और यूरोपीय संघ अब केवल व्यापारिक साझेदार नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक सहयोगी के रूप में आगे बढ़ रहे हैं।
27 जनवरी को आयोजित 16वें भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन में मुक्त व्यापार समझौते की औपचारिक घोषणा के साथ-साथ सुरक्षा और रक्षा सहयोग से जुड़े अहम समझौतों पर सहमति बनी। इससे यह स्पष्ट हो गया कि भारत और यूरोपीय संघ अब केवल व्यापारिक साझेदार नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक सहयोगी के रूप में आगे बढ़ रहे हैं।
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बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत-ईयू महाडील का महत्व
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता, रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया की अस्थिरता, आपूर्ति श्रृंखलाओं के पुनर्गठन और बढ़ते संरक्षणवाद से प्रभावित है। ऐसे समय में भारत-यूरोपीय संघ महाडील एक संतुलनकारी शक्ति के रूप में उभरती है, जो बहुपक्षीय व्यवस्था को मजबूती देने के साथ-साथ वैश्विक दक्षिण के लिए भी नई संभावनाएँ खोलती है।
प्रधानमंत्री द्वारा यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा की उपस्थिति में इस डील की घोषणा भारत की आर्थिक कूटनीति में आए आत्मविश्वासपूर्ण परिवर्तन को दर्शाती है। अधिकारियों के अनुसार कानूनी प्रक्रियाओं के बाद लगभग छह महीनों में एफटीए पर हस्ताक्षर होंगे और अगले वर्ष इसके लागू होने की संभावना है।
दशकों की वार्ता के बाद साकार हुआ ऐतिहासिक समझौता
भारत-ईयू एफटीए वर्षों की जटिल बातचीत का परिणाम है। टैरिफ, पर्यावरणीय मानक, श्रम कानून और नियमों को लेकर लंबे समय तक मतभेद बने रहे। लेकिन भारत की बढ़ती आर्थिक क्षमता और वैश्विक भूमिका ने यूरोप को यह स्वीकार करने पर मजबूर किया कि भारत केवल एक उभरता बाजार नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदार है।
भारत के लिए यह समझौता इसलिए अहम है क्योंकि इससे उसे उच्च-मूल्य वाले यूरोपीय बाजारों तक बेहतर पहुँच मिलेगी और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में उसकी भूमिका और मजबूत होगी।
सुरक्षा और रक्षा सहयोग: रणनीतिक साझेदारी का नया अध्याय
भारत-यूरोपीय संघ महाडील का दूसरा अहम पक्ष सुरक्षा और रक्षा सहयोग है। दोनों पक्ष रक्षा ढांचा समझौते, समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, आतंकवाद-रोधी प्रयासों और रक्षा प्रौद्योगिकी में सहयोग बढ़ाने के लिए सहमत हुए हैं।
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यूरोप, जो अमेरिका और चीन पर निर्भरता कम करना चाहता है, उसके लिए भारत एक विश्वसनीय लोकतांत्रिक भागीदार के रूप में उभरा है। वहीं भारत को इस साझेदारी से उन्नत तकनीक, निवेश और वैश्विक मंच पर प्रभावशाली भूमिका निभाने का अवसर मिलेगा।
प्रधानमंत्री की छह प्रमुख बातें: महाडील की आत्मा
प्रधानमंत्री द्वारा कही गई छह प्रमुख बातें इस समझौते की गहराई को स्पष्ट करती हैं—
साझा समृद्धि का ब्लूप्रिंट – यह केवल व्यापारिक समझौता नहीं, बल्कि दीर्घकालिक विकास का आधार है।
भारत का सबसे बड़ा FTA – यूरोपीय संघ के साथ समझौता भारत को वैश्विक व्यापार मानचित्र में नई ऊँचाई पर ले जाता है।
किसानों और MSME को लाभ – भारतीय कृषि और लघु उद्योगों को यूरोपीय बाजारों तक सीधी पहुँच मिलेगी।
मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर को बढ़ावा – ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ को अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिलेगा।
तीसरे देशों में संयुक्त परियोजनाएँ – इंडो-पैसिफिक से कैरेबियन तक त्रिपक्षीय सहयोग का विस्तार।
बहुपक्षवाद और वैश्विक संस्थानों में सुधार – संयुक्त राष्ट्र और WTO जैसे मंचों में सुधार की साझा प्रतिबद्धता।
वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की नई भूमिका
यह महाडील टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं को कम कर भारतीय उद्योगों को वैश्विक बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बनाएगी। तकनीक, पूंजी और बाजार की जरूरत वाले क्षेत्रों में यह समझौता मील का पत्थर साबित हो सकता है।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत-यूरोपीय संघ महाडील भारत को अमेरिका-चीन के बीच एक संतुलनकारी और नियम-आधारित शक्ति के रूप में स्थापित करती है।
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निष्कर्ष
समग्र रूप से देखें तो भारत-यूरोपीय संघ महाडील 21वीं सदी की बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की रणनीतिक छलांग है। यह समझौता भारत को केवल एक बड़ा बाजार नहीं, बल्कि एक वैश्विक नीति-निर्माता के रूप में स्थापित करता है। आने वाले वर्षों में इसका प्रभाव व्यापार, कूटनीति और वैश्विक शक्ति संतुलन—तीनों में स्पष्ट रूप से दिखाई देगा। यही कारण है कि इसे “मदर ऑफ ऑल डील” कहना पूरी तरह सार्थक है।
संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
