NTA के गठन के 9 साल बाद भी निजी परीक्षा केंद्रों पर निर्भर व्यवस्था, कैबिनेट के कई बड़े फैसले अब भी अधूरे
नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा)। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) की कार्यप्रणाली एक बार फिर चर्चा में है। हाल के वर्षों में विभिन्न राष्ट्रीय परीक्षाओं को लेकर उठे विवादों के बीच अब यह तथ्य भी सामने आया है कि एजेंसी के गठन के समय किए गए कई महत्वपूर्ण वादे आज तक पूरी तरह लागू नहीं हो सके हैं। इससे परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता, सुरक्षा और छात्रों की सुविधा को लेकर नए सवाल खड़े हो रहे हैं।
वर्ष 2017 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी के गठन को मंजूरी देते समय देशभर में अत्याधुनिक डिजिटल परीक्षा केंद्र स्थापित करने की परिकल्पना की थी। उद्देश्य था कि छात्रों को सुरक्षित, पारदर्शी और तकनीकी रूप से मजबूत परीक्षा व्यवस्था उपलब्ध कराई जाए, विशेषकर ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में रहने वाले अभ्यर्थियों को समान अवसर मिल सके। लेकिन करीब नौ वर्ष बाद भी यह लक्ष्य अधूरा दिखाई देता है।
हाल ही में NTA द्वारा ‘टेस्ट सेंटर नेटवर्क एंड ऑपरेशन’ के लिए जनरल मैनेजर (GM) पद पर भर्ती का विज्ञापन जारी किया गया। विज्ञापन के अनुसार इस अधिकारी की प्रमुख जिम्मेदारी विभिन्न परीक्षाओं के लिए मानक परीक्षा केंद्रों की पहचान और उनका संचालन सुनिश्चित करना होगी। इससे यह संकेत मिलता है कि एजेंसी आज भी बड़े पैमाने पर निजी और किराये के परीक्षा केंद्रों पर निर्भर है।
गठन के समय NTA के अपने लगभग 500 डिजिटल परीक्षा केंद्र विकसित करने की योजना बनाई गई थी। माना गया था कि यदि जिला और तहसील स्तर तक एजेंसी के स्वामित्व वाले कंप्यूटर आधारित केंद्र स्थापित हो जाते, तो परीक्षा संचालन अधिक सुरक्षित और नियंत्रित हो सकता था। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे पेपर लीक, तकनीकी गड़बड़ियों और केंद्र स्तर पर होने वाली अनियमितताओं की संभावना भी काफी कम हो सकती थी।
इसके साथ ही ग्रामीण, पहाड़ी और दूरस्थ क्षेत्रों के विद्यार्थियों को डिजिटल परीक्षा प्रणाली से परिचित कराने के लिए निःशुल्क मॉक टेस्ट, मोबाइल टेस्ट सेंटर और प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू करने का भी प्रस्ताव था। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और पूर्वोत्तर राज्यों जैसे क्षेत्रों के छात्रों को विशेष लाभ देने की योजना बनाई गई थी, लेकिन यह पहल भी अपेक्षित रूप से आगे नहीं बढ़ सकी।
एक अन्य महत्वपूर्ण प्रस्ताव अधिकांश राष्ट्रीय परीक्षाओं को वर्ष में दो बार आयोजित करने का था, ताकि छात्रों को बेहतर अवसर मिल सके। हालांकि वर्तमान में यह व्यवस्था सीमित परीक्षाओं तक ही सिमटी हुई है और व्यापक स्तर पर लागू नहीं हो पाई है।
हाल के पेपर लीक विवादों के बाद गठित डॉ. के. राधाकृष्णन समिति ने भी परीक्षा केंद्रों के पुनर्गठन, सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने तथा NTA के अपने परीक्षा केंद्र विकसित करने की सिफारिश की थी। इसके बावजूद अब तक स्थायी बुनियादी ढांचे के निर्माण की दिशा में अपेक्षित प्रगति दिखाई नहीं देती।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि NTA को भविष्य में अधिक विश्वसनीय और पारदर्शी परीक्षा एजेंसी बनाना है तो केवल प्रशासनिक सुधार पर्याप्त नहीं होंगे। इसके लिए आधुनिक डिजिटल परीक्षा केंद्रों का निर्माण, तकनीकी सुरक्षा, मजबूत निगरानी तंत्र और छात्रों को समान सुविधाएं उपलब्ध कराने जैसे मूलभूत सुधारों को प्राथमिकता देनी होगी।
