जिउतिया में सतपुतिया का खास महत्व, सात संतानों की कामना से जुड़ी है यह लोक परंपरा

चील-सियारिन से जीमूतवाहन तक

यतीन्द्र मिश्रा की रिपोर्ट

पुत्र की लंबी आयु, स्वास्थ्य, बल और यश की कामना के लिए माताओं द्वारा रखा जाने वाला जिउतिया यानी जीवित्पुत्रिका व्रत भारतीय लोक परंपरा का महत्वपूर्ण तप पर्व माना जाता है। इस व्रत से जुड़ी परंपराओं में ‘सतपुतिया’ सब्जी का विशेष स्थान है। लोक मान्यता के अनुसार सतपुतिया के गुच्छों में लगने वाले फल संतान, वंशवृद्धि और परिवार के सुख-समृद्धि के प्रतीक माने जाते हैं।
जिउतिया व्रत को केवल एक धार्मिक अनुष्ठान के बजाय मातृत्व की तपस्या और संतान की मंगलकामना से जुड़ा लोकपर्व माना जाता है। मान्यता है कि माताएं भगवान जीमूतवाहन से अपनी संतान की दीर्घायु, आरोग्य और रक्षा की प्रार्थना करती हैं। इसी परंपरा में व्रत के आरंभिक चरण में सतपुतिया का सेवन भी महत्वपूर्ण माना गया है।
सात संतानों की कामना से जुड़ा है सतपुतिया
लोक परंपरा में ‘सतपुतिया’ नाम को ‘सात’ और ‘पुत्र’ से जोड़कर देखा जाता है। यह सब्जी सामान्यतः गुच्छों में फलती है और कई स्थानों पर इसके एक साथ कई फल लगते हैं। इसी वजह से ग्रामीण और लोक संस्कृति में इसे संतान की संख्या, वंशवृद्धि तथा परिवार के निरंतर फलने-फूलने का प्रतीक माना गया।
जिउतिया के अवसर पर सतपुतिया की सब्जी खाने की परंपरा को इसी लोकविश्वास से जोड़ा जाता है। माताओं की कामना होती है कि जिस तरह सतपुतिया के फल एक साथ गुच्छों में विकसित होते हैं, उसी तरह उनकी संतान स्वस्थ, सुरक्षित और दीर्घायु रहे।
चील और सियारिन की कथा देती है व्रत की निष्ठा का संदेश
जिउतिया से जुड़ी सबसे चर्चित लोककथाओं में चील और सियारिन की कथा भी शामिल है। मान्यता के अनुसार दोनों सहेलियां थीं। उन्होंने महिलाओं को संतान की लंबी उम्र के लिए जिउतिया का कठिन व्रत करते देखा और स्वयं भी व्रत रखने का संकल्प लिया।
कथा के अनुसार व्रत के दौरान सियारिन भूख-प्यास सहन नहीं कर सकी और उसने व्रत के नियमों का पालन नहीं किया। वहीं चील ने पूरी निष्ठा के साथ उपवास पूरा किया।
लोककथा में बताया जाता है कि अगले जन्म में दोनों बहनों के रूप में जन्मीं। चील के पूर्वजन्म के व्रत के प्रभाव से उसके सात पुत्र हुए, जबकि सियारिन के बच्चों को लेकर विपरीत परिस्थितियां सामने आईं। बाद में उसे अपनी भूल का एहसास हुआ और उसने भी श्रद्धा तथा नियमपूर्वक व्रत किया।
यह कथा मुख्य रूप से व्रत की निष्ठा, संयम और मातृत्व की भावना का संदेश देती है।
जीमूतवाहन की कथा में त्याग और संतान रक्षा का प्रसंग
जीवित्पुत्रिका व्रत का संबंध राजा जीमूतवाहन की कथा से भी जोड़ा जाता है। लोकमान्यता के अनुसार जीमूतवाहन अत्यंत दयालु और परोपकारी थे। एक दिन जंगल में उन्हें एक नागमाता विलाप करती मिलीं।
कथा के अनुसार गरुड़ और नागों के बीच हुए समझौते के तहत प्रतिदिन एक नाग को गरुड़ के आहार के लिए भेजा जाता था। उस दिन नागमाता के पुत्र शंखचूड़ की बारी थी। उसकी मां का दुख देखकर जीमूतवाहन ने स्वयं को उसके स्थान पर प्रस्तुत कर दिया।
वे लाल वस्त्र धारण कर बलि-स्थल पर लेट गए। गरुड़ उन्हें लेकर गए और उनके त्याग एवं साहस से प्रभावित हुए। कथा के अनुसार बाद में गरुड़ ने जीमूतवाहन को जीवनदान दिया और नागों की बलि न लेने का वचन दिया।
इसी कथा के आधार पर लोकविश्वास में जिउतिया को संतान की रक्षा, दीर्घायु और मातृ तपस्या से जोड़कर देखा जाता है।
महाभारत से भी जोड़ी जाती है जीवित्पुत्रिका की कथा
जिउतिया से जुड़ी एक अन्य मान्यता महाभारत काल से संबंधित है। कथा के अनुसार युद्ध समाप्त होने के बाद अश्वत्थामा ने पांडवों के शिविर में जाकर द्रौपदी के पांचों पुत्रों का वध कर दिया था। बाद में उसने पांडव वंश को समाप्त करने के उद्देश्य से उत्तरा के गर्भ पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया।
लोककथा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तरा के मृत बालक को अपने पुण्य प्रभाव से जीवन प्रदान किया। यही बालक आगे चलकर राजा परीक्षित के नाम से प्रसिद्ध हुआ। गर्भ में मृत्यु के बाद जीवन प्राप्त करने की इस कथा को भी जीवित्पुत्रिका व्रत की लोकमान्यता से जोड़ा जाता है।
36 घंटे के कठिन व्रत से पहले सतपुतिया क्यों?
जिउतिया व्रत में कई स्थानों पर लगभग 36 घंटे तक निर्जला उपवास रखने की परंपरा है। इससे पहले किए जाने वाले आहार में स्थानीय परंपराओं के अनुसार सतपुतिया की सब्जी को विशेष महत्व दिया जाता है।
सतपुतिया को सामान्यतः पानी और फाइबर वाली सब्जी माना जाता है। स्थानीय भोजन परंपरा में इसे हल्का और आसानी से पचने वाला आहार भी माना जाता है। हालांकि व्रत के दौरान या बाद में भोजन संबंधी कोई भी निर्णय व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार होना चाहिए।
मातृत्व, प्रकृति और लोकविश्वास का पर्व है जिउतिया
जिउतिया की परंपरा में धार्मिक आस्था के साथ-साथ लोकजीवन और प्रकृति का गहरा संबंध दिखाई देता है। सतपुतिया जैसे स्थानीय फल-सब्जियों को संतान और वंशवृद्धि के प्रतीक के रूप में देखना इसी लोक संस्कृति का हिस्सा है।
माताएं कठिन तपस्या के माध्यम से अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की कामना करती हैं। इस दृष्टि से जिउतिया केवल उपवास का पर्व नहीं, बल्कि मां के त्याग, प्रेम और संतान के प्रति उसकी मंगलकामना को अभिव्यक्त करने वाली लोक परंपरा भी है।

Editor CP pandey

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