इबोला का नया वैश्विक खतरा: कोरोना के बाद फिर दहशत की आहट, WHO अलर्ट के बाद दुनिया सतर्क

गोदिया। कोरोना महामारी की भयावह यादें अभी पूरी तरह धुंधली भी नहीं हुई थीं कि दुनिया के सामने एक बार फिर एक गंभीर स्वास्थ्य संकट की आशंका गहराने लगी है। अफ्रीकी देशों डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DRC) और युगांडा में तेजी से फैल रहे इबोला वायरस संक्रमण ने वैश्विक स्वास्थ्य एजेंसियों, वैज्ञानिकों और सरकारों की चिंता बढ़ा दी है। हालात की गंभीरता को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इसे “पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी ऑफ इंटरनेशनल कंसर्न” घोषित कर दिया है।
इबोला के बढ़ते मामलों के बीच भारत और अफ्रीकी संघ ने 28 से 31 मई 2026 तक नई दिल्ली में प्रस्तावित चौथे भारत-अफ्रीका फोरम शिखर सम्मेलन को स्थगित कर दिया है। इस निर्णय ने स्पष्ट कर दिया है कि दुनिया इस खतरे को बेहद गंभीरता से ले रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार इस बार चिंता का कारण इबोला वायरस का दुर्लभ “बुंडीबुग्यो स्ट्रेन” है, जिसके लिए अभी तक कोई पूर्ण रूप से स्वीकृत वैक्सीन या सुनिश्चित उपचार उपलब्ध नहीं है। यही वजह है कि वैज्ञानिक समुदाय इसे केवल अफ्रीका तक सीमित बीमारी नहीं, बल्कि संभावित वैश्विक चुनौती के रूप में देख रहा है।
युगांडा की राजधानी कम्पाला सहित कई घनी आबादी वाले क्षेत्रों में संदिग्ध मामलों की मौजूदगी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ा दी है। हालांकि WHO ने अभी इसे महामारी घोषित नहीं किया है, लेकिन संक्रमण की तेज रफ्तार और इसकी उच्च मृत्यु दर ने पूरी दुनिया को अलर्ट मोड में ला दिया है।
इबोला वायरस पहली बार वर्ष 1976 में अफ्रीका के ज़ैरे (अब डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो) और सूडान में सामने आया था। वर्ष 2014-16 में पश्चिमी अफ्रीका में फैले इबोला संकट ने वैश्विक स्वास्थ्य ढांचे की कमजोरियों को उजागर कर दिया था। उस समय हजारों लोगों की मौत हुई थी और कई देशों की स्वास्थ्य प्रणालियां चरमरा गई थीं।
विशेषज्ञ बताते हैं कि इबोला मुख्य रूप से संक्रमित जंगली जानवरों, खासकर फ्रूट बैट यानी चमगादड़ों से इंसानों में पहुंचता है। इसके बाद संक्रमित व्यक्ति के खून, पसीने, लार, उल्टी, मल या अन्य शारीरिक तरल पदार्थों के संपर्क से संक्रमण तेजी से फैलता है। यह वायरस हवा से नहीं फैलता, लेकिन संक्रमित व्यक्ति की देखभाल करने वाले लोग, स्वास्थ्यकर्मी और अंतिम संस्कार में शामिल लोग सबसे अधिक जोखिम में रहते हैं।
इबोला के लक्षण बेहद गंभीर होते हैं। संक्रमित व्यक्ति में तेज बुखार, सिरदर्द, अत्यधिक कमजोरी, मांसपेशियों में दर्द, उल्टी, दस्त और पेट दर्द जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। गंभीर मामलों में शरीर के अंदरूनी हिस्सों में रक्तस्राव शुरू हो जाता है और मरीज की हालत तेजी से बिगड़ सकती है। WHO के अनुसार विभिन्न स्ट्रेनों में इसकी मृत्यु दर 30 प्रतिशत से लेकर 90 प्रतिशत तक देखी गई है। वर्तमान बुंडीबुग्यो स्ट्रेन में भी मृत्यु दर 30 से 50 प्रतिशत के बीच मानी जा रही है।
अफ्रीका में अब तक सैकड़ों संदिग्ध मामले सामने आ चुके हैं और 130 से अधिक मौतों की पुष्टि हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक आंकड़े इससे अधिक हो सकते हैं क्योंकि कई दूरदराज इलाकों में मेडिकल रिपोर्टिंग और जांच व्यवस्था सीमित है।
भारत सरकार ने भी इस खतरे को लेकर सतर्कता बढ़ा दी है। स्वास्थ्य मंत्रालय और नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने प्रभावित देशों से आने वाले यात्रियों की एयरपोर्ट पर विशेष स्क्रीनिंग शुरू कर दी है। दिल्ली सहित देश के प्रमुख अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर मेडिकल टीमों को अलर्ट पर रखा गया है। यात्रियों के यात्रा इतिहास की जांच की जा रही है और किसी भी संदिग्ध लक्षण पर तत्काल स्वास्थ्य जांच की व्यवस्था की गई है।
केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक आयोजित कर राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को तैयार रहने के निर्देश दिए गए हैं। अस्पतालों में आइसोलेशन वार्ड, लैब टेस्टिंग और इमरजेंसी चिकित्सा सुविधाओं की समीक्षा भी शुरू कर दी गई है। फिलहाल भारत में इबोला का कोई मामला सामने नहीं आया है, लेकिन सरकार किसी भी तरह की लापरवाही के पक्ष में नहीं है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन, जंगलों की कटाई और वन्यजीव क्षेत्रों में बढ़ते मानव हस्तक्षेप के कारण ऐसे वायरसों का खतरा बढ़ रहा है। कोरोना, निपाह, सार्स और इबोला जैसी बीमारियां इसी पर्यावरणीय असंतुलन की चेतावनी मानी जा रही हैं।
दुनिया के लिए सबसे बड़ा सबक यही है कि संक्रमण को शुरुआती चरण में नियंत्रित करना बेहद जरूरी है। वैश्विक सहयोग, वैज्ञानिक निगरानी, सीमाओं पर सतर्कता और जनजागरूकता ही इस खतरे से बचाव का सबसे प्रभावी रास्ता माना जा रहा है।
फिलहाल भारत में स्थिति नियंत्रण में है, लेकिन वैश्विक यात्रा और आपसी संपर्क के इस दौर में कोई भी देश पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता। इबोला का मौजूदा संकट एक बार फिर यह याद दिला रहा है कि वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा केवल किसी एक देश की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरी मानवता की साझा जिम्मेदारी है।
संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
