लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा डेस्क) देशभर में यूजीसी के नए नियमों को लेकर जबरदस्त बवाल मचा हुआ है। खासकर सवर्ण समाज का विरोध अब सड़क से लेकर सियासी गलियारों तक पहुंच चुका है। छात्र संगठनों के साथ-साथ सामाजिक संगठनों ने भी यूजीसी के नए नियमों को लेकर मोर्चा खोल दिया है। इस बीच सत्तारूढ़ दल भाजपा के भीतर भी इस मुद्दे पर असहजता साफ दिखाई देने लगी है।
सबसे दिलचस्प मोड़ तब आया, जब भाजपा के कद्दावर और बाहुबली नेता रहे पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह के दोनों बेटे इस मुद्दे पर आमने-सामने खड़े नजर आए। एक ओर विधायक बेटे ने यूजीसी के नए नियमों का खुला विरोध किया, तो दूसरी ओर सांसद बेटे ने इन्हीं नियमों का समर्थन कर दिया।
🔹 विधायक प्रतीक भूषण सिंह ने क्यों जताया विरोध
भाजपा विधायक प्रतीक भूषण सिंह ने सवर्ण समाज की नाराजगी को जायज ठहराते हुए कहा कि यूजीसी के नए नियम पारंपरिक सामाजिक संतुलन और अवसरों को प्रभावित कर सकते हैं। उनका मानना है कि इन नियमों से सामान्य वर्ग के छात्रों में असंतोष बढ़ा है और सरकार को इस पर पुनर्विचार करना चाहिए।
प्रतीक भूषण सिंह ने साफ संकेत दिए कि वे अपने क्षेत्र की सामाजिक भावना के साथ खड़े हैं और सवर्ण समाज विरोध की आवाज को दबाया नहीं जा सकता।
🔹 सांसद करण भूषण सिंह नियमों के पक्ष में
वहीं दूसरी ओर, भाजपा सांसद करण भूषण सिंह का रुख बिल्कुल उलट है। वे उस संसदीय कमेटी के सदस्य रहे हैं, जिसने यूजीसी के नए नियमों के मसौदे को तैयार किया। करण भूषण सिंह का कहना है कि ये नियम उच्च शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, पारदर्शिता लाने और लंबे समय में छात्रों के हित में हैं।
उनके अनुसार, विरोध से ज्यादा जरूरी है नियमों की सही जानकारी और उनके दूरगामी लाभों को समझना।
🔹 भाजपा के लिए बढ़ी असहजता
एक ही परिवार के भीतर दो विपरीत राय ने भाजपा को भी असहज कर दिया है। जहां एक ओर पार्टी सरकार में रहते हुए यूजीसी के नए नियमों का बचाव कर रही है, वहीं जमीनी स्तर पर भाजपा नेताओं को सवर्ण समाज विरोध का सामना करना पड़ रहा है। यह विवाद आने वाले समय में पार्टी की रणनीति को भी प्रभावित कर सकता है।
🔹 सियासत से आगे सामाजिक संदेश
बृजभूषण शरण सिंह के बेटों का यह मतभेद सिर्फ पारिवारिक नहीं, बल्कि यह दिखाता है कि यूजीसी के नए नियम किस कदर समाज और राजनीति को दो हिस्सों में बांट रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि सरकार इस विरोध को कैसे संभालती है और क्या नियमों में कोई संशोधन होता है।
