Thursday, February 26, 2026
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एकादशी व्रत विधि: शास्त्रोक्त पूजा, नियम और पारण की सम्पूर्ण जानकारी

एकादशी व्रत क्यों है इतना फलदायी? जानें शास्त्रों का रहस्य


सनातन धर्म में एकादशी व्रत विधि अत्यंत पवित्र और फलदायी मानी जाती है। प्रत्येक मास के शुक्ल और कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को भगवान विष्णु की उपासना की जाती है। शास्त्रों के अनुसार एकादशी व्रत करने से पापों का नाश, मानसिक शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह व्रत विशेष रूप से भगवान विष्णु को समर्पित है, जिन्हें सृष्टि का पालनहार कहा गया है।
धार्मिक ग्रंथों में वर्णित एकादशी व्रत विधि केवल उपवास भर नहीं, बल्कि संयम, साधना और भक्ति का पर्व है। इस लेख में हम शास्त्रोक्त नियमों के अनुसार एकादशी व्रत, पूजा विधि, कथा, मंत्र, और पारण की सम्पूर्ण जानकारी विस्तार से प्रस्तुत कर रहे हैं।
एकादशी व्रत का धार्मिक महत्व
एकादशी का अर्थ है चंद्र मास की ग्यारहवीं तिथि। पद्म पुराण और विष्णु पुराण में एकादशी का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि इस दिन उपवास रखने से मन और इंद्रियों पर नियंत्रण प्राप्त होता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार—
एकादशी व्रत करने से नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है।
घर में सुख-समृद्धि आती है।
पूर्व जन्म के पापों से मुक्ति मिलती है।
वैकुण्ठ धाम की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
पूर्व तैयारी: दशमी तिथि का नियम
एकादशी व्रत विधि के अनुसार व्रत की शुरुआत दशमी तिथि से ही मानी जाती है।
दशमी के दिन निम्न नियम अपनाएं—
शाम को सात्विक भोजन करें।
प्याज, लहसुन और मांसाहार का त्याग करें।
संयमित और हल्का भोजन करें।
मन में व्रत का संकल्प लें।
शास्त्रों में कहा गया है कि दशमी के दिन संयम रखने से एकादशी व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
एकादशी सुबह संकल्प विधि
व्रती को ब्रह्म मुहूर्त में उठना चाहिए। स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें।
भगवान विष्णु के समक्ष बैठकर दाहिने हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर संकल्प मंत्र बोलें—
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”
यह मंत्र 108 बार जपने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है।
एकादशी पूजा विधि (शास्त्रोक्त प्रक्रिया)
एकादशी व्रत विधि के अंतर्गत पूजा की विस्तृत प्रक्रिया इस प्रकार है—

प्रतिमा स्थापना
पूजा चौकी पर पीला वस्त्र बिछाएं। भगवान विष्णु या शालिग्राम शिला स्थापित करें।

अभिषेक
गंगाजल, पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) और शुद्ध जल से स्नान कराएं।

वस्त्र और चंदन
पीले वस्त्र अर्पित करें। पीला चंदन लगाएं।

पुष्प और तुलसी
पीले पुष्प, फल, धूप, दीप अर्पित करें।
तुलसी दल अवश्य चढ़ाएं— बिना तुलसी के पूजा अधूरी मानी जाती है।

कथा और आरती
एकादशी व्रत कथा पढ़ें।
विष्णु चालीसा का पाठ करें।
भगवान विष्णु की आरती करें।
व्रत के नियम
एकादशी व्रत विधि में नियमों का पालन अनिवार्य है—
ब्रह्मचर्य का पालन करें।
क्रोध और असत्य से बचें।
दिनभर जप-भजन करें।
आवश्यकता अनुसार फलाहार या निर्जला उपवास रखें।
जो लोग पूर्ण उपवास नहीं रख सकते, वे दूध, फल, मखाना, साबूदाना आदि का सेवन कर सकते हैं।
प्रमुख एकादशी व्रत
वर्ष में 24 एकादशी आती हैं। प्रमुख एकादशी इस प्रकार हैं—
निर्जला एकादशी
देवउठनी एकादशी
मोक्षदा एकादशी
कामिका एकादशी
पापमोचनी एकादशी
हर एकादशी की कथा और महत्व अलग-अलग है, किंतु सभी में भगवान विष्णु की आराधना का विधान समान है।
पारण विधि (व्रत खोलना)
द्वादशी तिथि को सूर्योदय के बाद पारण किया जाता है।
पारण के नियम—
पहले ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन कराएं।
दान दें (अन्न, वस्त्र, दक्षिणा)।
तत्पश्चात स्वयं सात्विक भोजन ग्रहण करें।
ध्यान रखें कि पारण सही समय पर करना आवश्यक है, अन्यथा व्रत का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता।
एकादशी व्रत के लाभ
मानसिक शांति और आत्मबल में वृद्धि
रोग प्रतिरोधक क्षमता में सुधार
आध्यात्मिक उन्नति
पारिवारिक सुख-समृद्धि
वैज्ञानिक दृष्टि से भी उपवास शरीर को डिटॉक्स करने में सहायक माना जाता है।
एकादशी व्रत विधि केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि का माध्यम है। शास्त्रों के अनुसार श्रद्धा और नियमपूर्वक किया गया एकादशी व्रत जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाता है। भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने के लिए यह व्रत अत्यंत फलदायी माना गया है।
यदि आप विधिपूर्वक एकादशी व्रत विधि का पालन करते हैं, तो निश्चित ही आध्यात्मिक और सांसारिक दोनों लाभ प्राप्त होंगे।

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