बड़ा सवाल: जब योगी सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ पर अपनी ही पार्टी के विधायक को भरोसा नहीं, तो जनता कहाँ जाए? सबूत मिटा देगी साहिबा, फौरन करो सस्पेंड!
गौरव कुशवाहा/विशेष संवाददाता
लखनऊ: देवरिया के शिक्षक कृष्ण मोहन सिंह आत्महत्या कांड ने उत्तर प्रदेश की राजनीति और अफसरशाही के बीच की काली साठगांठ को चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है। जब जिलाधिकारी की रिपोर्ट को सचिवालय की फाइलों में ‘दफन’ करने की कोशिश हुई, तो देवरिया सदर के विधायक डॉ. शलभ मणि त्रिपाठी को अपनी ही सरकार के तंत्र के खिलाफ मोर्चा खोलना पड़ा। विधायक ने बेसिक शिक्षा मंत्री को लिखे अपने कड़े पत्र (पत्रांक: MLA/VIP/544558/26) में वह कह दिया है, जिसे कहने से जिले के आला अफसर कतरा रहे थे आरोपी BSA साक्ष्यों को नष्ट कर सकती हैं, उन्हें तत्काल हटाओ!
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क्या अपनी ही सरकार के अफसरों पर विधायक को भरोसा नहीं?
विधायक का यह पत्र महज एक सिफारिश नहीं, बल्कि ‘अविश्वास प्रस्ताव’ है उस सिस्टम के खिलाफ जो एक भगोड़ी अधिकारी को संरक्षण दे रहा है। पत्र में स्पष्ट उल्लेख है कि सुसाइड नोट और वीडियो संदेश जैसे पुख्ता साक्ष्यों के बाद भी कार्रवाई न होना जनमानस में ‘संशय’ पैदा कर रहा है। यह सवाल उठता है कि क्या मुख्यमंत्री के ‘बुलडोजर’ की चाबी उन अफसरों के पास है जो ‘वसूली सिंडिकेट’ के साझेदार हैं? विधायक की यह आशंका कि अभिलेखों के साथ छेड़छाड़ या उन्हें नष्ट किया जा सकता है, प्रशासन की कार्यशैली पर सबसे बड़ा सवालिया निशान है।
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’भगोड़ी’ साहिबा और DVR का ‘मौन’ खेल
एक तरफ विधायक पत्र लिख रहे हैं, दूसरी तरफ विभाग के ‘दीमक’ सबूत चाट रहे हैं। जिलाधिकारी दिव्या मित्तल ने 9 घंटे के ऑडिट में जिस फुटेज की पुष्टि की थी, वह पुलिस के हाथ लगते ही ‘कोरा’ निकलता है। सोमवार से लापता शालिनी श्रीवास्तव ने न चार्ज दिया, न छुट्टी ली, फिर भी शासन की ‘खामोशी’ उनके लिए कवच बनी हुई है। क्या यह मान लिया जाए कि एक क्लास-1 अफसर का रसूख, एक शिक्षक की चिता से उठी न्याय की लौ से भी बड़ा है?
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मनी ट्रेल: कब टूटेगा सिंडिकेट?
गुलरिहा पुलिस अब बैंक स्टेटमेंट और कॉल डिटेल के जरिए उस 48 लाख रुपये की कड़ी जोड़ रही है, जिसने कृष्ण मोहन सिंह की जमीन बिकवा दी। मोबाइल और डिजिटल ट्रांजेक्शन की जांच तो शुरू हो गई है, लेकिन असली सवाल ‘गिरफ्तारी’ का है। विधायक के पत्र ने अब गेंद शासन के पाले में डाल दी है या तो शालिनी श्रीवास्तव सस्पेंड होकर जेल जाएंगी, या फिर योगी सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति पर ‘रसूख का ग्रहण’ लग जाएगा।
