कार्यशाला के छठवें दिन आनलाईन व्याख्यान व योग प्रशिक्षण संपन्न
योग को केवल एक्सरसाइज के रूप में नहीं लेना चाहिए: प्रो. द्वारका नाथ
गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय स्थित महायोगी गुरु श्रीगोरक्षनाथ शोधपीठ द्वारा कुलपति प्रो. पूनम टण्डन के संरक्षण में चल रहे सप्तदिवसीय ग्रीष्मकालीन योग कार्यशाला ’योग एवं आजीविका’ के छठवें दिन भी प्रतिभागियों की काफी संख्या रही। योग प्रशिक्षण डा. विनय कुमार मल्ल के द्वारा दिया गया। योग प्रशिक्षण में लगभग 55 लोगों ने भाग लिया। जिसमे स्नातक, परास्नातक आदि के विद्यार्थी एवं अन्य लोग सम्मिलित हुए।
अपरान्ह मे आनलाइन माध्यम से योग एवं आजीविका विषयक कार्यशाल का शुभारम्भ मुख्य अतिथि के स्वागत के साथ शोधपीठ के उप निदेशक डॉ. कुशलनाथ मिश्र द्वारा किया गया।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रो. द्वारका नाथ, दर्शन विभाग, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर ने अपने उद्बोधन में कहा कि योग कोई पंथ या संप्रदाय नहीं है। योग महाविज्ञान है। योग के द्वारा जीवन का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। योग पूरे भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है। योग की जननी भारत है। योग अनेक प्रक्रियाओं का संकलन है। जिसमे मन व शरीर में सामंजस्य स्थापित कर मोक्ष प्राप्त करते है। योग को केवल एक्सरसाइज के रूप में नहीं लेना चाहिए। योग का संबंध शरीर, मन व आत्मा तीनों से है। उन्होंने योग पर गीता के व्याख्या पर भी विस्तार से चर्चा करते हुए कर्म योग पर प्रकाश डाला।
कार्यक्रम का संचालन शोधपीठ के रिसर्च एसोसिएट डॉ. सुनील कुमार द्वारा किया गया। शोधपीठ के सहायक निदेशक डॉ. सोनल सिंह द्वारा मुख्य वक्ता एवं समस्त श्रोताओं का धन्यवाद ज्ञापित किया गया। शोधपीठ के सहायक ग्रन्थालयी डॉ. मनोज कुमार द्विवेदी, शोध अध्येता हर्षवर्धन सिंह, डॉ. कुंवर रणंजय सिंह, चिन्मयानन्द मल्ल आदि उपस्थित रहे।
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