अपने मतलब के अलावा कौन किसको पूछता है! पेड़ जब सूख जाए तो परिंदे भी बसेरा नहीं करते

✍️ कैलाश सिंह

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। समय बदल रहा है और इस बदलते जमाने में रिश्तों की परिभाषा भी बदल गई है। आज जब जीवन की राहों पर वक्त की बेरहमी से तिलमिलाएं हुए लोग सामने से गुजरते हैं, तो मन से एक ही आवाज उठती है— इस भरी दुनिया में कोई हमारा न हुआ! गैर तो गैर, आज के दौर में अपने भी सहारा देने से कतराने लगे हैं।जब तक शरीर में इंद्रियों का रंगमंच सजा रहता है, मनुष्य दुनिया को मुट्ठी में भर लेने के सपने देखता है।

अपनों के सपनों को संवारने के लिए न जाने कितनों को रौंद देता है। लेकिन जैसे ही वक्त करवट बदलता है, तन्हाई अंगड़ाई लेने लगती है। वही अपने, जिनके लिए थककर गिरने तक मेहनत की जाती है, पास आने से भी दूरी बना लेते हैं। घोर अंधेरी रातों में जब लोग सपनों की दुनिया में खोए रहते हैं, तब किसी बूढ़ी आंख का अकेलापन बरसात की तरह झूमकर बरसता है। मन अपनों के स्पर्श को तरसता है और चंचल यादें दिल के क्षितिज पर बिजली की तरह कड़कती हैं।

अवतरण दिवस से लेकर मरण दिवस तक आदमी वही करता है जिसकी परिणति अंत तक सार्थक नहीं होती। माया की छाया में जो कुछ कमाया, जो कुछ लुटाया—अंतिम पड़ाव में उसका फल केवल तन्हाई की तड़पन ही बनकर साथ आता है।परिवार टूट रहे हैं, आस्था कलंकित हो रही है, और बड़े–छोटे का लिहाज समाप्त हो चुका है। तन्हा रहने की ‘रश्म’ चलन बन चुकी है। हालात इतने भयावह हो गए हैं कि बाप की मौत पर भी स्वार्थी सपूत श्मशान पर नग्न तांडव करते दिख जाते हैं।

संवेदनाएं मर चुकी हैं, इंसानियत शर्मशार है, और व्यवहार में स्वार्थ का जहर घुल चुका है।आधुनिकता के उपकरणों ने दिखावटी जीवन का दंभ बढ़ा दिया है। रिश्तों की बुनियाद रोज़ दरक रही है। इंसान असहाय हो गया है और उसकी सोच पर स्वार्थ का पर्दा इस कदर चढ़ गया है कि मर्यादा भी उसके लिए बोझ बन गई है।

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जीवन स्थाई निवास नहीं, केवल एक पड़ाव है—यह जानते हुए भी मनुष्य मोह-माया से बाहर नहीं आ पाता। उम्र के तराजू पर कर्मों की खेती जब फल देती है, तो उसके पुण्य-पाप की असली तस्वीर खाट पर दिखाई देती है।दुर्भाग्य यह है कि जिनके लिए जीवन भर मेहनत की भट्ठी में खुद को जलाया, वही अपने अंतिम समय में पास आने से कतराते हैं। अंतिम सफर में अपने ही दुआओं के सहयात्री बन सकते हैं—पर इसके लिए जीवन में सत्कर्मों की खेती आवश्यक है।

धन, संपत्ति, वैभव—इन सबका गुमान छोड़ देना चाहिए। क्योंकि थोड़ा-सा स्वार्थ का झोंका भी इंसान को तिरस्कार की गहराई में डुबो देता है।याद रखिए—हम खाली हाथ आए थे, खाली हाथ ही जाएंगे। समय रहते संभल जाएं, तो सफर के अंतिम पड़ाव में राह आसान हो सकती है।

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Karan Pandey

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