बलिया (राष्ट्र की परम्परा)। नवानगर ब्लॉक स्थित ग्राम पंचायत किशोर चेतन आज भी बुनियादी सुविधाओं के गंभीर अभाव से जूझ रहा है। विकास के दावों के बीच गांव की जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोलती नजर आती है। जल निकासी, अतिक्रमण, सार्वजनिक शौचालय, शवदाह स्थल, कचरा प्रबंधन, पोखरों की बदहाल स्थिति और खेल सुविधाओं की दुर्दशा जैसी समस्याओं ने ग्रामीणों का जीवन कठिन बना दिया है। करीब 3542 मतदाताओं वाले इस गांव के लोग अब जनप्रतिनिधियों और प्रशासन से ठोस कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।
सार्वजनिक शौचालय और जल निकासी बनी बड़ी समस्या
गांव में बने सार्वजनिक शौचालय अधिकांश समय बंद रहते हैं, जिससे महिलाओं, बुजुर्गों और राहगीरों को भारी परेशानी होती है। खुले में शौच की मजबूरी स्वच्छ भारत मिशन के उद्देश्यों पर भी सवाल खड़े करती है। वहीं प्राथमिक विद्यालय परिसर में जल निकासी की गंभीर समस्या बनी हुई है। बरसात के दिनों में जलभराव के कारण स्कूल और आसपास का इलाका प्रभावित होता है, जिससे बच्चों की पढ़ाई पर असर पड़ता है।
पोखरों पर अतिक्रमण से बढ़ा जलभराव
ग्रामीणों के अनुसार गांव के पोखरों पर अवैध कब्जा और मिट्टी भराई के कारण जलसंचयन क्षमता घट गई है। नतीजतन बरसात में गांव तालाब में तब्दील हो जाता है और कई मोहल्लों में सड़कों पर पानी भर जाता है। यदि पोखरों को अतिक्रमण मुक्त कराया जाए तो जलभराव की समस्या काफी हद तक कम हो सकती है।
मिनी स्टेडियम पर कब्जा, खेल गतिविधियां ठप
पंचायत स्तर पर खेलों को बढ़ावा देने के लिए बनाए गए मिनी स्टेडियम की हालत भी चिंताजनक है। रख-रखाव के अभाव और गिट्टी-बालू डालकर किए गए अवैध कब्जों से खेल पूरी तरह बंद हो चुका है। कभी गांव की पहचान रहा यह मैदान आज वीरान पड़ा है, जिससे युवा खेल से दूर होकर मोबाइल की ओर बढ़ रहे हैं।
स्वास्थ्य, कचरा निस्तारण और शवदाह मार्ग की दुश्वारियां
गांव में कचरा निस्तारण की नियमित व्यवस्था नहीं है, जिससे गंदगी और दुर्गंध फैल रही है और बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है। इसके अलावा शवदाह गृह तक उपयुक्त रास्ते का अभाव एक गंभीर मानवीय समस्या बन गया है। अंतिम संस्कार के दौरान ग्रामीणों को भारी असुविधा झेलनी पड़ती है।
आंशिक कार्य, लेकिन रख-रखाव का अभाव
गलियों-नालियों की मरम्मत, मंदिरों के आसपास डमरू ईंट बिछाने और खेल मैदान की प्रस्तावित गैलरी व जिम जैसे कुछ कार्य जरूर हुए हैं, लेकिन रख-रखाव के अभाव में वे भी उपेक्षित नजर आते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि योजनाएं शुरू तो होती हैं, पर स्थायी समाधान और संरक्षण नहीं हो पाता।
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ग्रामीणों की आवाज़
• ईश्वर देव पासवान: “बरसात में पूरा गांव तालाब बन जाता है। नालियां जाम हैं और पोखरों पर कब्जा है।”
• हरिभगवान चौबे: “शवदाह गृह तक रास्ता नहीं है, अंतिम संस्कार में भारी दिक्कत होती है।”
• शिवजी राय: “मिनी स्टेडियम पर कब्जा है, खेल बंद हो गए हैं।”
• संजय यादव: “सार्वजनिक शौचालय हमेशा बंद रहता है।”
• शिवाजी राय: “पोखरों से अतिक्रमण हटे तो जलसंकट कम होगा।”
• छांगुर चौबे: “अवैध कब्जों से रास्ते सिकुड़ गए हैं।”
• भीम राजभर: “कचरा निस्तारण नहीं, बीमारियों का डर है।”
• कृष्णा राजभर: “विकास चुनिंदा इलाकों तक सीमित है।”
• शिवदास राय: “सौंदर्यीकरण हुआ, लेकिन बुनियादी जरूरतें अधूरी हैं।”
• कृष्णा यादव: “स्टेडियम से कब्जा हटे तो युवाओं को दिशा मिलेगी।”
ग्रामीणों का कहना है कि अतिक्रमण हटाना, जल निकासी सुधारना, शौचालय चालू करना, कचरा प्रबंधन लागू करना और खेल मैदान को मुक्त कराना यदि प्राथमिकता बने, तो ग्राम पंचायत किशोर चेतन की तस्वीर बदल सकती है। अब देखना यह है कि प्रशासन और जनप्रतिनिधि इन जमीनी समस्याओं पर कब और कितना ठोस कदम उठाते हैं।
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