US-Iran talks: अमेरिका और ईरान के बीच आज यानी शुक्रवार को ओमान की राजधानी मस्कट में अहम बातचीत होने जा रही है। यह वार्ता ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर केंद्रित है, लेकिन इसके बावजूद दोनों देशों के बीच एजेंडे को लेकर गहरे मतभेद बने हुए हैं। एक ओर अमेरिका बातचीत के दायरे को व्यापक बनाना चाहता है, वहीं ईरान इसे सीमित रखने के पक्ष में है। ऐसे में यह बैठक कूटनीति और टकराव के बीच संतुलन की एक कठिन परीक्षा मानी जा रही है।
अमेरिका का कहना है कि ईरान के साथ किसी भी समझौते में केवल परमाणु कार्यक्रम ही नहीं, बल्कि मिसाइल कार्यक्रम, क्षेत्रीय प्रॉक्सी ग्रुप्स और मानवाधिकार मुद्दों को भी शामिल किया जाना चाहिए। इसके उलट ईरान का रुख साफ है कि बातचीत सिर्फ परमाणु गतिविधियों और उस पर लगे प्रतिबंधों को हटाने तक ही सीमित रहनी चाहिए। इसी बुनियादी मतभेद के कारण वार्ता की दिशा और परिणाम को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
इस्तांबुल से मस्कट क्यों बदला गया स्थान
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जानकारी दी कि वार्ताएं शुक्रवार को मस्कट में होंगी। उन्होंने ओमान को बातचीत की व्यवस्था के लिए धन्यवाद भी दिया। पहले इन वार्ताओं का स्थान इस्तांबुल तय किया गया था, लेकिन आखिरी समय पर ईरान ने इसे बदलकर ओमान करने की मांग रखी। इसके साथ ही ईरान ने द्विपक्षीय फॉर्मेट पर भी जोर दिया, जिसे बाद में स्वीकार किया गया।
ओमान लंबे समय से अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहा है। इसी वजह से मस्कट को एक बार फिर संवेदनशील वार्ता के लिए चुना गया है। माना जा रहा है कि ओमान की तटस्थ छवि और दोनों देशों के साथ संतुलित संबंध इस बातचीत को आगे बढ़ाने में मदद कर सकते हैं।
अमेरिकी टीम और ट्रंप की रणनीति
अमेरिकी टीम में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और राष्ट्रपति के दामाद जारेड कुशनेर शामिल होंगे। ट्रंप प्रशासन की ओर से यह संकेत दिया गया है कि कूटनीति उनकी पहली प्राथमिकता है, लेकिन अगर बातचीत विफल रहती है तो अन्य विकल्पों पर भी विचार किया जा सकता है।
डोनाल्ड ट्रंप पहले ही ईरान को लेकर कड़ा रुख अपना चुके हैं। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर वार्ता सफल नहीं होती तो ईरान के लिए हालात “बुरे” हो सकते हैं और सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई को इसकी चिंता करनी चाहिए। व्हाइट हाउस प्रेस सचिव केरोलीन लेविट ने बताया कि ट्रंप ईरान की “शून्य परमाणु क्षमता” की मांग कर रहे हैं और उनके पास “अन्य कई रास्ते” भी मौजूद हैं।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने भी स्पष्ट किया है कि किसी भी संभावित समझौते में ईरान के मिसाइल कार्यक्रम, प्रॉक्सी ग्रुप्स जैसे हमास और हिजबुल्लाह, और घरेलू दमन जैसे मुद्दों को शामिल किया जाना जरूरी है। यह बयान ईरान की उस मांग के विपरीत है, जिसमें वह बातचीत को सीमित रखने की बात कर रहा है।
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बातचीत के बीच बढ़ता सैन्य तनाव
जहां एक ओर कूटनीतिक बातचीत की तैयारी चल रही है, वहीं दूसरी ओर क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां भी तेज हो गई हैं। ईरान का दावा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण है, लेकिन अमेरिका और इजरायल इस दावे पर संदेह जताते रहे हैं। इसी संदेह के चलते हाल के दिनों में दोनों पक्षों के बीच तनाव और बढ़ गया है।
हाल ही में अमेरिकी फाइटर जेट्स ने अरब सागर में एक ईरानी ड्रोन को नष्ट किया, जो एक अमेरिकी जहाज के करीब आक्रामक रूप से पहुंच गया था। इसके अलावा अमेरिका ने ईरान के क्षेत्र के आसपास अब्राहम लिंकन कैरियर स्ट्राइक ग्रुप तैनात किया है। हजारों अतिरिक्त सैनिक, एयरक्राफ्ट कैरियर और निगरानी विमान भी क्षेत्र में भेजे गए हैं।
इसके जवाब में ईरान ने क्रोरमशहर-4 बैलिस्टिक मिसाइल तैनात की है। इन सभी घटनाओं ने यह साफ कर दिया है कि बातचीत के बावजूद दोनों देश सैन्य तैयारी में भी कोई कमी नहीं छोड़ रहे हैं। यह स्थिति वार्ता के माहौल को और जटिल बना रही है।
वार्ता रद्द होने की आशंका और फिर बहाली
बीते कुछ दिनों पहले ऐसी खबरें भी आई थीं कि अमेरिका-ईरान वार्ता रद्द हो सकती है। हालांकि बाद में मध्य पूर्व के कई नेताओं, जिनमें खाड़ी देशों के नेता भी शामिल हैं, ने व्हाइट हाउस पर दबाव डाला। इसके बाद बातचीत को दोबारा शुरू करने का फैसला लिया गया।
क्षेत्रीय देशों को डर है कि अगर यह वार्ता विफल होती है, तो इसका सीधा असर पूरे मध्य पूर्व की स्थिरता पर पड़ सकता है। खासतौर पर खाड़ी अरब देशों को चिंता है कि किसी अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के जवाब में ईरान उनके क्षेत्र को निशाना बना सकता है।
खाड़ी देशों और वैश्विक नेताओं की चिंता
अमेरिका खुद भी इस बात को लेकर असमंजस में है कि यह बातचीत सफल होगी या नहीं। तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन और जर्मनी के चांसलर जैसे वैश्विक नेताओं ने दोनों पक्षों से संयम बरतने और संघर्ष रोकने की अपील की है। वहीं खाड़ी देशों में इस बात को लेकर बेचैनी है कि अगर तनाव बढ़ा तो उनके क्षेत्र में अस्थिरता और सुरक्षा संकट पैदा हो सकता है।
यह वार्ता इसलिए भी वैश्विक स्तर पर अहम मानी जा रही है, क्योंकि इसके असफल होने की स्थिति में मध्य पूर्व में सीधा सैन्य टकराव हो सकता है। इससे न सिर्फ क्षेत्रीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति और ऊर्जा बाजारों पर भी असर पड़ने की आशंका है।
रेड लाइनों पर अड़े दोनों पक्ष
फिलहाल स्थिति यह है कि अमेरिका और ईरान दोनों अपनी-अपनी “रेड लाइनों” पर अड़े हुए हैं। अमेरिका व्यापक समझौते की बात कर रहा है, जबकि ईरान सीमित एजेंडे से आगे बढ़ने को तैयार नहीं है। मस्कट में होने वाली यह बातचीत इसी टकराव भरे माहौल में शुरू होने जा रही है।
अब पूरी दुनिया की नजर इस बैठक पर टिकी है कि क्या यह वार्ता तनाव कम करने की दिशा में कोई ठोस कदम उठा पाएगी या फिर मतभेद और गहरे होंगे। फिलहाल इतना तय है कि इस बातचीत का असर सिर्फ अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे मध्य पूर्व और वैश्विक राजनीति पर पड़ेगा।
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