डिजिटल शिक्षा और बदलती शिक्षा व्यवस्था
✍️ सोमनाथ मिश्रा, (राष्ट्र की परम्परा)
देश की शिक्षा व्यवस्था तेजी से डिजिटल युग में प्रवेश कर चुकी है। स्मार्ट क्लासरूम, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, ई-कंटेंट और वर्चुअल पढ़ाई अब शिक्षा का अहम हिस्सा बन चुके हैं। लेकिन इस डिजिटल बदलाव के बीच एक गंभीर सवाल उभरकर सामने आ रहा है—क्या बिना समुचित प्रशिक्षण के पढ़ा रहे शिक्षक बच्चों के भविष्य के साथ न्याय कर पा रहे हैं?
ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के अनेक स्कूलों में आज भी शिक्षक डिजिटल तकनीक के प्रभावी उपयोग में सक्षम नहीं हैं। न उन्हें आधुनिक डिजिटल टूल्स का पर्याप्त प्रशिक्षण मिला है और न ही नई शिक्षण पद्धतियों की गहरी समझ। ऐसे में डिजिटल शिक्षा कई जगह अवसर से ज्यादा चुनौती बनती जा रही है।
प्रशिक्षण की कमी से गिरती शिक्षा की गुणवत्ता
शिक्षक किसी भी शिक्षा प्रणाली की रीढ़ होते हैं। जब वही शिक्षक आधुनिक शिक्षण तकनीकों, डिजिटल बोर्ड, ऑनलाइन असाइनमेंट और बदले हुए पाठ्यक्रम ढांचे से अनजान हों, तो शिक्षा की गुणवत्ता पर असर पड़ना तय है।
कई स्कूलों में पढ़ाई केवल औपचारिकता बनकर रह गई है, जबकि आज के बच्चों को समझ-आधारित, कौशल-उन्मुख और व्यवहारिक शिक्षा की आवश्यकता है।
डिजिटल कक्षाओं के दौरान तकनीकी समस्याओं का समाधान न हो पाने से बच्चे भ्रमित होते हैं। इसका सीधा असर उनकी बुनियादी समझ, आत्मविश्वास और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी पर पड़ता है।
डिजिटल शिक्षा: सुविधा या नया बोझ?
डिजिटल शिक्षा का उद्देश्य पढ़ाई को सरल, रोचक और प्रभावी बनाना था, लेकिन प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी के कारण यह कई बार छात्रों के लिए बोझ साबित हो रही है।
तकनीकी समस्या आने पर कक्षा बाधित हो जाती है, शिक्षक समाधान नहीं दे पाते और बच्चों का भरोसा शिक्षा व्यवस्था से धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल साक्षरता केवल छात्रों के लिए नहीं, बल्कि शिक्षकों के लिए भी उतनी ही जरूरी है।
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समाधान क्या हो सकता है?
इस गंभीर समस्या का समाधान केवल स्कूलों में तकनीक उपलब्ध कराने से नहीं होगा। इसके लिए सरकार और शिक्षा विभाग को ठोस कदम उठाने होंगे, जैसे—
• शिक्षकों के लिए नियमित और अनिवार्य प्रशिक्षण कार्यक्रम
• डिजिटल टूल्स और आधुनिक शिक्षण पद्धतियों पर वर्कशॉप
• ग्रामीण स्कूलों में विशेष टेक्निकल सपोर्ट सिस्टम
• शिक्षक चयन प्रक्रिया में प्रशिक्षण और दक्षता को प्राथमिकता
यदि शिक्षक प्रशिक्षित नहीं होंगे, तो डिजिटल शिक्षा का सपना अधूरा ही रह जाएगा। बच्चों का भविष्य केवल पाठ्यक्रम से नहीं, बल्कि उसे पढ़ाने वाले शिक्षक की क्षमता और समझ से तय होता है।
समय रहते यदि इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो एक पूरी पीढ़ी अधूरी शिक्षा की शिकार हो सकती है।
अब सवाल यह नहीं है कि डिजिटल शिक्षा जरूरी है या नहीं, असली सवाल यह है—क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था इसके लिए पूरी तरह तैयार है?
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