पाकिस्तान को अपने खास दोस्त माने जाने वाले तुर्किए से बड़ा झटका लगा है। अंकारा ने साफ कर दिया है कि वह सऊदी अरब और पाकिस्तान के साथ किसी भी बहुपक्षीय रक्षा समझौते में शामिल नहीं होगा। एएफपी की रिपोर्ट के मुताबिक, तुर्किए के रक्षा अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगान की सरकार न तो ऐसे किसी समझौते का हिस्सा है और न ही इस पर विचार कर रही है।
तुर्किए के एक शीर्ष सैन्य सूत्र ने बताया कि पाकिस्तान की अपील के बावजूद अंकारा किसी त्रिपक्षीय या बहुपक्षीय आपसी रक्षा समझौते में रुचि नहीं रखता। सूत्रों के अनुसार, सऊदी अरब भी बहुपक्षीय रक्षा ढांचे के बजाय केवल द्विपक्षीय रक्षा समझौतों को प्राथमिकता देता है। इसी वजह से सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किए के बीच किसी साझा रक्षा गठबंधन की संभावनाएं कमजोर पड़ गई हैं।
पाकिस्तानी सेना की स्थिति पर तुर्किए की चिंता
तुर्किए के सुरक्षा सूत्रों ने पाकिस्तानी सेना की मौजूदा स्थिति को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उनका कहना है कि पाकिस्तान पहले से ही तीन सीमाओं पर सक्रिय है, जिनमें भारत, अफगानिस्तान और ईरान शामिल हैं। इसके अलावा देश के भीतर भी पाकिस्तान को कई सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
तुर्किए के अनुसार, सऊदी अरब के साथ रक्षा सहयोग ने भी पाकिस्तानी सेना को और अधिक बांट दिया है। इन सभी कारणों से पाकिस्तानी सेना की परिचालन क्षमता पर असर पड़ा है, जो किसी भी बहुपक्षीय रक्षा समझौते के तहत अतिरिक्त जिम्मेदारियां निभाने में बाधा बन सकती है।
पाकिस्तान की सेनाएं पहले से दबाव में
एक वरिष्ठ तुर्किए रक्षा अधिकारी ने कहा कि पाकिस्तानी सेनाएं पहले से ही भारी दबाव में काम कर रही हैं। यही हकीकत किसी भी आपसी रक्षा समझौते के तहत पाकिस्तान की भूमिका को सीमित करती है। तुर्किए अधिकारियों ने यह भी इशारा किया कि पाकिस्तान का अधिकांश सैन्य साजो-सामान चीन से आता है।
एयर डिफेंस और एयरफोर्स जैसे अहम क्षेत्रों में पाकिस्तान की चीनी सैन्य तकनीक पर निर्भरता को देखते हुए तुर्किए किसी बाध्यकारी बहुपक्षीय रक्षा ढांचे में शामिल होने को लेकर सतर्क है। अंकारा का मानना है कि ऐसी निर्भरता भविष्य में रणनीतिक और तकनीकी जटिलताएं पैदा कर सकती है।
आर्थिक स्थिति भी बड़ी बाधा
तुर्किए ने पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति को भी रक्षा समझौते में शामिल न होने की एक अहम वजह बताया है। तुर्किए के रक्षा सूत्रों का कहना है कि मजबूत सेना के लिए मजबूत अर्थव्यवस्था जरूरी होती है। उनके अनुसार, न तो पाकिस्तान और न ही तुर्किए की सेनाओं के पास सऊदी अरब के स्तर पर रक्षा आधुनिकीकरण में निवेश करने की क्षमता है।
इसी कारण त्रिपक्षीय रक्षा गठबंधन को व्यावहारिक नहीं माना जा रहा है। तुर्किए का मानना है कि आर्थिक सीमाएं किसी भी दीर्घकालिक सैन्य गठबंधन को कमजोर बना सकती हैं।
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रक्षा समझौते से इनकार, लेकिन रिश्ते मजबूत
हालांकि तुर्किए ने किसी बहुपक्षीय रक्षा समझौते की संभावना को खारिज कर दिया है, लेकिन उसने यह भी जोर देकर कहा है कि पाकिस्तान के साथ उसके रक्षा संबंध मजबूत बने हुए हैं। अंकारा पहले से ही पाकिस्तान को सैन्य साजो-सामान, वायु रक्षा प्रणालियां, ड्रोन तकनीक और अन्य उपकरण उपलब्ध करा रहा है।
तुर्किए के अधिकारियों के हवाले से आई यह रिपोर्ट वहां के विदेश मंत्री के उस बयान का भी समर्थन करती है, जिसमें उन्होंने सुरक्षा के लिए दूसरों पर निर्भर रहने के खिलाफ चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा था कि जब तक क्षेत्रीय देश अपनी सुरक्षा चुनौतियों की जिम्मेदारी खुद नहीं लेते, तब तक स्थिरता संभव नहीं है।
इस्लामिक नाटो की कोशिशों को झटका
पाकिस्तान की ओर से मध्य पूर्व में एक तथाकथित “इस्लामिक नाटो” बनाने की कोशिशें की जा रही थीं। 30 जनवरी को तुर्किए के चीफ ऑफ जनरल स्टाफ सेल्चुक बायरक्तारओग्लू की पाकिस्तान यात्रा के दौरान इस्लामाबाद की ओर से प्रचार किया गया था कि जल्द ही किसी बड़े रक्षा समझौते का ऐलान हो सकता है।
हालांकि, तुर्किए के ताजा रुख के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि ऐसा कोई समझौता फिलहाल होने वाला नहीं है। इससे पाकिस्तान की क्षेत्रीय रणनीति और रक्षा कूटनीति को बड़ा झटका लगा है।
