वॉशिंगटन (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अपने चिर-परिचित मुद्दे—“क्रेडिट”—को लेकर सुर्खियों में हैं। इस बार मंच था इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ द्विपक्षीय मुलाकात का। एजेंडा गाज़ा, फ़िलिस्तीन, मिडिल ईस्ट, अब्राहम अकॉर्ड और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर विषयों का था, लेकिन बातचीत का रुख अचानक ट्रंप के निजी दुखड़े की ओर मुड़ गया—उन्हें उनके दावों का श्रेय क्यों नहीं मिलता?
मीडिया के सामने ट्रंप ने कहा कि उन्होंने “आठ-आठ युद्ध” सुलझाए, जिनमें भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव को कम कराने का दावा भी शामिल है। ट्रंप का कहना है कि नई दिल्ली और इस्लामाबाद के बीच युद्धविराम अमेरिका की मध्यस्थता और व्यापारिक रियायतों के कारण संभव हुआ, लेकिन उन्हें इसका श्रेय नहीं दिया गया। उन्होंने यह बात नेतन्याहू और अपने वरिष्ठ सहयोगियों—विदेश मंत्री मार्को रुबियो, रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ और जेरेड कुशनर—की मौजूदगी में कही।
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हालांकि, यह बयान ऐसे समय आया है जब रूस-यूक्रेन युद्ध ट्रंप के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। जिस संघर्ष को वह कभी “एक फोन कॉल” से सुलझाने की बात करते थे, वही अब उनकी बयानबाज़ी का सबसे कमजोर कड़ी बनता दिख रहा है। पुतिन को मनाने और जेलेंस्की पर दबाव बनाने की कोशिशें आसान नहीं रहीं, और इसी असहजता के बीच ट्रंप नए मोर्चों पर क्रेडिट की मांग करते नज़र आते हैं।
दिलचस्प यह रहा कि जब उन्हें एहसास हुआ कि कैमरे हर शब्द रिकॉर्ड कर रहे हैं, तो उन्होंने माहौल हल्का करने की कोशिश की और पत्रकारों से कहा—“आप लोग लंच का आनंद लीजिए।” लेकिन तब तक संदेश जा चुका था: ट्रंप की राजनीति में मुद्दे बदल सकते हैं, पर क्रेडिट की चाह नहीं।
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