डॉ. अरुणेश नीरन को श्रद्धांजलि: भोजपुरी साहित्य के सशक्त स्तंभ का अवसान

कुशीनगर (राष्ट्र की परम्परा डेस्क) हिन्दी और भोजपुरी साहित्य को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रतिष्ठा दिलाने वाले, विश्व भोजपुरी सम्मेलन के संस्थापक और जनप्रिय साहित्यकार डॉ. अरुणेश नीरन अब हमारे बीच नहीं रहे। उनका निधन 15 जुलाई 2025 को हो गया, जिससे साहित्यिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई। नागरी प्रचारिणी सभा सहित अनेक साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाओं के संरक्षक व मार्गदर्शक रहे नीरन जी का अवसान एक अपूरणीय क्षति है।

इस दुखद अवसर पर आज नागरी प्रचारिणी सभा की ओर से अध्यक्ष डॉ. जयनाथ मणि त्रिपाठी की अध्यक्षता में एक श्रद्धांजलि सभा आयोजित की गई, जिसमें साहित्य, शिक्षा, पत्रकारिता और राजनीति के अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने भाग लिया और डॉ. नीरन को अपने-अपने शब्दों में श्रद्धासुमन अर्पित किए।

सभा के उपाध्यक्ष डॉ. दिवाकर प्रसाद तिवारी ने भावुक स्वर में कहा कि “नीरन जी निर्भीक, निडर और प्रेरणास्रोत साहित्यकार थे। उन्होंने कभी मान-अपमान की परवाह नहीं की और हर समय दूसरों को लिखने के लिए प्रेरित करते रहे। वे यायावर जीवन जीते थे और साहित्य साधना में रमे रहते थे।”

डॉ. मधुसूदन मणि त्रिपाठी ने उनके सतत अध्ययनशील स्वभाव को रेखांकित करते हुए कहा कि “नीरन जी विभाग से अधिक पुस्तकालय में समय बिताते थे, यही उनकी सफलता का कारण रहा।”

सभा के पूर्व मंत्री इन्द्र कुमार दीक्षित ने भाव-विह्वल स्वर में कहा कि “भोजपुरी लेखन की शुरुआत उन्होंने ही मुझसे करवाई थी। वास्तव में हम नीरन नहीं हो सकते, लेकिन उनके द्वारा खींची गई लकीर पर चल सकते हैं।”

सदर विधायक शलभ मणि त्रिपाठी ने उन्हें ऊर्जावान व्यक्तित्व का धनी बताया और कहा, “उनका साथ मेरे लिए प्रेरणा रहा। वे साहित्यकार थे, मैं पत्रकार था — लेकिन हमारे बीच संवाद की एक जीवंत कड़ी बनी रही।”

बुद्ध पी. जी. कॉलेज, कुशीनगर के प्रतिनिधि गौरव त्रिपाठी ने कहा, “नीरन जी छोटे कद के बड़े आदमी थे। जब भोजपुरी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही थी, तब उन्होंने मंच बनाकर उसे अंतरराष्ट्रीय पहचान दी।”

डॉ. शकुन्तला दीक्षित ने कहा, “नीरन जी अब पार्थिव रूप से भले न हों, पर उनके शब्द आज भी जीवित हैं। उनकी सहजता सबको सम्मोहित कर लेती थी।”
अनिल मिश्र ने कहा, “नीरन जी ने जितनों को मंच दिया, उतना शायद ही किसी और साहित्यकार ने दिया हो।”

पूर्व विधायक व सन्त विनोबा पी. जी. कॉलेज देवरिया के प्रो. डॉ. सत्यप्रकाश मणि त्रिपाठी ने कहा, “उन्होंने भोजपुरी को वैश्विक मंच पर स्थापित किया। साहित्य और समसामयिक घटनाओं पर उनकी पैनी नजर रहती थी।”

डॉ. सुधाकर तिवारी ने निजी संस्मरण साझा करते हुए कहा कि “नीरन जी चाहें तो बड़े विश्वविद्यालयों में जा सकते थे, लेकिन उन्होंने देवरिया नहीं छोड़ा — क्योंकि उन्हें गांव और भोजपुरी से विशेष प्रेम था।”
नंदलाल मणि ने उन्हें “सरस और प्रवाहमान” बताया, जो उनके उपनाम ‘नीरन’ से मेल खाता है।

कार्यक्रम में आशुतोष त्रिपाठी, अंजलि अरोड़ा, खुशबू और सौदागर सिंह ने गीतों के माध्यम से श्रद्धांजलि अर्पित की।
रविकांत मणि त्रिपाठी ने ओजस्वी संचालन करते हुए कार्यक्रम को भावपूर्ण दिशा दी।

इस अवसर पर अनेक विशिष्टजनों की गरिमामयी उपस्थिति रही, जिनमें प्रमुख थे —
कौशल कुमार मिश्र, वृद्धि चन्द्र विश्वकर्मा, दुर्गा पाण्डेय, हिमांशु कुमार सिंह, डॉ. मधुसूदन मिश्र, गोपाल कृष्ण सिंह रामू, डॉ. सौरभ श्रीवास्तव, रवीन्द्र नाथ तिवारी, विनय कुमार बरनवाल, विजय प्रसाद, रजनीश मोहन गोरे, भृगुदेव मिश्र, रमेश चंद्र त्रिपाठी, रामेश्वर तिवारी, लक्ष्मी कान्त तिवारी, पार्वती देवी गौरा, रंजीता श्रीवास्तव, नित्यानंद आनंद, योगेन्द्र पाण्डेय, मार्कण्डेय पति तिवारी, प्रेम नारायण मणि, सुबास राय, जितेन्द्र सिंह, डॉ. डी.एन. पाण्डेय, संजय पाण्डेय, कृष्ण शंकर मिश्र, अनिल कुमार मिश्र आदि।

सभा के पूर्व अध्यक्ष आचार्य परमेश्वर जोशी ने दूरभाष के माध्यम से श्रद्धांजलि देते हुए कहा, “नीरन जी कभी अप्रिय नहीं बोलते थे। जो भी उनसे मिला, वही उनका अपना हो गया।”

श्रद्धांजलि सभा के संयोजक डॉ. संजय कानोडिया ने कविता के माध्यम से उन्हें भावांजलि अर्पित की।

अंत में अध्यक्ष डॉ. जयनाथ मणि त्रिपाठी ने कहा, “नीरन जी मेरे सच्चे मित्र थे। उनकी कमी जीवन भर खलेगी। भोजपुरी साहित्य को उन्होंने एक नई ऊंचाई दी। उनका स्मरण ही हमारी सच्ची श्रद्धांजलि है।”

सभा के मंत्री डॉ. अनिल कुमार त्रिपाठी ने आभार प्रकट करते हुए कहा कि “नीरन जी हमारे मन-मस्तिष्क में सदैव जीवित रहेंगे। उनके मार्गदर्शन को स्मरण करते हुए हम साहित्य की सेवा करते रहेंगे।”

कार्यक्रम का समापन दो मिनट के मौन के साथ हुआ, जहां उपस्थित सभी जनों ने नम आंखों से इस महान साहित्य पुरुष को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

rkpNavneet Mishra

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