बलिया(राष्ट्र की परम्परा)
मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) कार्यालय में कार्यरत सहायक दयाबाबू एवं वरिष्ठ सहायक मुन्ना बाबू के स्थानांतरण पर फिलहाल रोक लग गई है। दोनों कर्मचारियों ने अपने ट्रांसफर को लेकर उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था, जिसके बाद न्यायालय ने मामले में हस्तक्षेप करते हुए स्थानांतरण पर स्थगन आदेश जारी कर दिया है।बताया जा रहा है कि सीएमओ बलिया द्वारा किया गया यह स्थानांतरण नियमों के विपरीत था। आरोप है कि जिन कर्मचारियों का एक वर्ष के भीतर ही ट्रांसफर कर दिया गया, वहीं कई ऐसे कर्मचारी हैं जो पिछले चार वर्षों से अधिक समय से एक ही पटल (डेस्क) पर कार्य कर रहे हैं, लेकिन उनका स्थानांतरण नहीं किया गया। इसको लेकर विभाग के अंदर भी असंतोष की स्थिति बनी हुई है।सूत्रों के अनुसार, दयाबाबू और मुन्ना बाबू का ट्रांसफर एक साल के भीतर ही कर दिया गया था, जबकि शासन के नियमों के अनुसार सामान्यतः एक निर्धारित अवधि के बाद ही स्थानांतरण किया जाना चाहिए। इसी को आधार बनाते हुए दोनों कर्मचारियों ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। न्यायालय ने प्रथम दृष्टया मामले को गंभीर मानते हुए ट्रांसफर आदेश पर रोक लगा दी है।
इस मामले में एक और गंभीर आरोप यह भी है कि सीएमओ कार्यालय में पटल वितरण वरिष्ठता के आधार पर नहीं किया गया है। कई वरिष्ठ कर्मचारियों को नजरअंदाज कर जूनियर कर्मचारियों को महत्वपूर्ण पटल सौंप दिए गए हैं, जिससे कार्य प्रणाली पर भी प्रभाव पड़ रहा है। कर्मचारियों का कहना है कि यदि वरिष्ठता का सही ढंग से पालन किया जाए तो कार्यों का निष्पादन अधिक पारदर्शी और सुचारु रूप से हो सकता है।इसके अलावा महिला अस्पताल में भी लंबे समय से जमे कर्मचारियों को लेकर सवाल उठ रहे हैं। जानकारी के अनुसार, कुछ बाबू करीब 8 वर्षों से एक ही स्थान पर कार्यरत हैं, लेकिन उनका ट्रांसफर नहीं किया गया। इससे यह स्पष्ट होता है कि स्थानांतरण नीति का पालन समान रूप से नहीं हो रहा है।वरिष्ठ सहायक मुन्ना बाबू ने बताया कि उन्होंने न्यायालय की शरण इसलिए ली क्योंकि उनके साथ अन्याय हुआ है। उन्होंने कहा कि यदि विभाग में पारदर्शिता और नियमों का पालन होता, तो उन्हें कोर्ट जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। उन्होंने यह भी कहा कि सभी कर्मचारियों के साथ समान व्यवहार होना चाहिए और स्थानांतरण नीति का पालन निष्पक्ष तरीके से किया जाना चाहिए।फिलहाल न्यायालय के आदेश के बाद दोनों कर्मचारियों को राहत मिली है, लेकिन इस पूरे मामले ने सीएमओ कार्यालय की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना यह होगा कि विभाग आगे क्या कदम उठाता है और क्या स्थानांतरण प्रक्रिया में पारदर्शिता लाई जाती है या नहीं।
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