विलुप्त हो रहे पारंपरिक कुएं, संरक्षण योजनाएं कागजों में सिमटीं

👉 मिठौरा ब्लॉक के गांवों में धरोहर बनते कुएं, सरकार की योजना को जमीन पर लागू करने में नाकामी

(रिपोर्ट : डॉ. सतीश पाण्डेय व नीरज कुमार ✍️)

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। कभी गांवों की जीवन रेखा रहे पारंपरिक कुएं आज अतीत की चीज़ बनते जा रहे हैं। महराजगंज जनपद के मिठौरा ब्लॉक में स्थित नदुआ, बसंतपुर राजा, परसा राजा, दरहटा जैसे कई गांवों में कभी हर गली-मुहल्ले में एक कुआं हुआ करता था। लेकिन अब इनकी जगह या तो मलबा भर गया है या वे खंडहर में तब्दील हो चुके हैं। उत्तर प्रदेश सरकार की धरोहर संरक्षण योजना के बावजूद इन जल स्रोतों का पुनर्जीवन केवल योजनाओं तक सीमित रह गया है।

धरोहर भी, जरिया भी गांव के बुजुर्गों की मानें तो ये कुएं केवल पीने के पानी का स्रोत नहीं थे, बल्कि ग्रामीण समाज में मेल-जोल, त्योहारों, और परंपराओं का केंद्र भी थे। 75 वर्षीय रामलाल कहते हैं, “जब गांव में कुएं थे, तब हैंडपंप की जरूरत नहीं पड़ती थी। अब तो हैंडपंप भी सूखने लगे हैं।” यह बात पानी के संकट की गंभीरता को भी दर्शाती है।

📉 गिरता भूजल स्तर और बढ़ती निर्भरता गांवों में बढ़ती गहराई वाली बोरिंग और हैंडपंप पर निर्भरता से भूजल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है। पारंपरिक कुएं जहां एक ओर सांस्कृतिक विरासत हैं, वहीं ये भूजल रिचार्ज में भी अहम भूमिका निभाते थे। बाबुलाल चौहान कहते हैं, “अगर इन्हें समय रहते संरक्षित किया जाए तो यह आने वाली पीढ़ियों के लिए वरदान बन सकते हैं।”

📋 योजनाएं हैं, पर अमल नहीं उत्तर प्रदेश सरकार ने हाल ही में पारंपरिक जल स्रोतों के संरक्षण और पुनर्निर्माण हेतु एक विशेष अभियान शुरू किया है। योजना के अंतर्गत प्रत्येक गांव में कुओं, तालाबों, बावड़ियों जैसे जलस्रोतों की मरम्मत और संरक्षण का वादा किया गया है। लेकिन मिठौरा ब्लॉक के अधिकांश गांवों में न तो इनकी सफाई हुई है, न ही कोई मरम्मत कार्य शुरू किया गया है।

📌 प्रशासनिक उदासीनता बनी बाधा ग्रामीणों का आरोप है कि जिला प्रशासन और खंड स्तरीय अधिकारी इस योजना को लेकर पूरी तरह उदासीन हैं। “सरकारी योजना सराहनीय है, लेकिन निगरानी और जवाबदेही के अभाव में यह ठंडी पड़ गई है,” ग्रामीणों ने बताया।

🗣️ बीडीओ का बयान खंड विकास अधिकारी (B.D.O.) मिठौरा राहुल सागर ने “राष्ट्र की परम्परा” से बातचीत में कहा, “ऐसे सभी गांवों की रिपोर्ट के लिए संबंधित अधिकारियों को निर्देशित किया जाएगा ताकि कुओं के संरक्षण पर ठोस पहल की जा सके।”

पारंपरिक कुएं केवल पानी का स्रोत नहीं हैं, वे हमारी सांस्कृतिक पहचान और जल प्रबंधन की धरोहर हैं। यदि इन्हें समय रहते संरक्षित नहीं किया गया, तो हम केवल अपने इतिहास से ही नहीं, बल्कि अपने भविष्य से भी हाथ धो बैठेंगे। यह समय है कि सरकार और प्रशासन मिलकर ज़मीन पर ठोस काम करें — कागज़ों में नहीं।

Editor CP pandey

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