महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। आज का समाज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां एक ओर तकनीकी, शैक्षिक और आर्थिक क्षेत्रों में तेज़ प्रगति दिखाई दे रही है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक पीड़ा, मानसिक तनाव और नैतिक मूल्यों के ह्रास की चिंताजनक तस्वीर भी सामने आ रही है। आधुनिक सुविधाओं और डिजिटल क्रांति ने जीवन को आसान बनाया है, लेकिन मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक समरसता पर इसका विपरीत प्रभाव भी पड़ा है।
डिजिटल युग में सूचना और संचार के साधनों ने दुनिया को करीब ला दिया है। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के नए अवसर खुले हैं। युवा वर्ग आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है और समाज में नवाचार व आधुनिक सोच को बढ़ावा मिल रहा है। यह प्रगति निश्चित रूप से समाज के लिए आशाजनक संकेत है।
लेकिन इसी विकास की आड़ में सामाजिक समस्याएं भी गहराती जा रही हैं। परिवारों में संवाद की कमी, रिश्तों में भावनात्मक दूरी, बढ़ती प्रतिस्पर्धा और उपभोक्तावादी सोच ने मानसिक अवसाद और तनाव को जन्म दिया है। आर्थिक असमानता बढ़ने से समाज दो वर्गों में बंटता नजर आ रहा है—एक संपन्न और दूसरा संघर्षरत।
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सबसे बड़ी चिंता सामाजिक संवेदनशीलता में आई गिरावट को लेकर है। लोगों में दूसरों के दुःख-दर्द के प्रति उदासीनता बढ़ रही है। अपराध, भ्रष्टाचार, नशाखोरी और नैतिक पतन समाज की जड़ों को कमजोर कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर सक्रियता बढ़ी है, लेकिन वास्तविक जीवन में सामाजिक जिम्मेदारी और सहयोग की भावना सीमित होती जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि समाज की सच्ची प्रगति तभी संभव है जब भौतिक विकास के साथ-साथ मानवीय मूल्य, नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी को भी समान महत्व दिया जाए। शिक्षा, परिवार और समाज को मिलकर ऐसे नागरिक तैयार करने होंगे जो न केवल सफल हों, बल्कि संवेदनशील और जिम्मेदार भी हों।
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