जनता की पीड़ा पर सत्ता की चुप्पी — आखिर कब टूटेगी?

कैलाश सिंह

महराजगंज(राष्ट्र की परम्परा)। देश की राजनीति में वादों और भाषणों की गूंज तो खूब सुनाई देती है, लेकिन जनता की असल पीड़ा पर सत्ता की खामोशी गहरी होती जा रही है। जनता रोजमर्रा की समस्याओं से जूझ रही है—मूलभूत सुविधाएं, महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, न्याय में देरी और विभागीय लापरवाहियां—लेकिन इन मुद्दों पर सत्ता का मौन सवाल खड़े कर रहा है। लोग पूछ रहे हैं—हमारी आवाज़ आखिर कब सुनी जाएगी? जनता की तकलीफें बढ़ती गईं, पर प्रतिक्रियाएं नहीं आईं।
ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क, बिजली, स्वास्थ्य और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं का संकट आज भी कायम है। शहरों में रोजगार और महंगाई का बोझ आम लोगों की कमर तोड़ रहा है। किसानों को समर्थन मूल्य की चिंता, छात्रों को अवसरों की कमी, महिलाओं को सुरक्षा का सवाल—हर मोर्चे पर लोग परेशान हैं। लेकिन इन समस्याओं पर सत्ता पक्ष की प्रतिक्रिया या तो बहुत देर से आती है या फिर कागजी बयान तक सीमित रह जाती है।

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जब जनता सड़क पर उतरती है, तब भी चुप्पी_विभिन्न जिलों में लोग बार-बार प्रदर्शन करते हैं—टूटी सड़कें, लंबित योजनाएं, विभागीय भ्रष्टाचार, थानों में सुनवाई नहीं,अस्पतालों में सुविधा की कमी।
लेकिन हर बार सुनवाई वही पुराने आश्वासनों पर टिक जाती है।
प्रश्न यह है: कब तक जनता अपनी पीड़ा लेकर भटकती रहेगी?
विशेषज्ञों के अनुसार कई कारण इस खामोशी के पीछे छिपे हैं, असुविधाजनक मुद्दों से बचना,विभागीय मिलीभगत पर कार्रवाई से परहेज,योजनाओं की असफलता स्वीकार न करने का डर, राजनीतिक छवि पर असर की आशंका, चुनावी रणनीतियों का दबाव।यह चुप्पी आम जनता में निराशा और आक्रोश दोनों पैदा कर रही है।

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जनता का कहना है, वोट मांगने के समय घर-घर आते हैं, पर हमारी समस्याओं पर बोलना तक जरूरी नहीं समझते! यही कारण है कि लोगों का भरोसा संस्थाओं और जनप्रतिनिधियों से कम होता जा रहा है। कई लोग कहते हैं कि अधिकारी सुनते नहीं, नेता पहुंचते नहीं और व्यवस्था चलती नहीं।
मौन खतरनाक होता है — लोकतंत्र में तो और भी, लोकतंत्र जनता की आवाज पर टिका होता है। जब सरकारें उन आवाजों को सुनना बंद कर देती हैं, तो समस्याएं दूनी-चौगुनी हो जाती हैं। पानी हो या बिजली, कानून व्यवस्था हो या योजनाओं का लाभ—सवाल उठते रहेंगे और जवाब मिलते नहीं दिख रहे।सत्ता की चुप्पी तब टूटेगी जब—जनता की शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई हो, जनप्रतिनिधि जमीनी संवाद बढ़ाएं, विभागीय रिपोर्टें सार्वजनिक हों,लापरवाह अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई हो,नीति और कार्यान्वयन के बीच की खाई पाटी जाए।
जवाबदेही ही लोकतंत्र की रीढ़ है।यदि यह रीढ़ कमजोर पड़ी, तो जनता का विश्वास और व्यवस्था—दोनों खतरे में पड़ जाएंगे।

Editor CP pandey

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