गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)l नगर निगम गोरखपुर द्वारा शहर के प्रमुख स्थल इंद्रा बाल बिहार का नाम परिवर्तित कर उसे “चटोरी गली” के रूप में विकसित किया गया। इस पहल का उद्देश्य शहरवासियों को एक सुव्यवस्थित, स्वच्छ और आकर्षक फूड स्ट्रीट उपलब्ध कराना था, जहां लोग पैदल भ्रमण करते हुए विभिन्न व्यंजनों का आनंद ले सकें। इसी उद्देश्य के तहत चटोरी गली के भीतर दुकानों को एक समान स्वरूप दिया गया, वाहनों के प्रवेश पर रोक लगाई गई और आवागमन को नियंत्रित किया गया।
लेकिन अब इस योजना के क्रियान्वयन पर सवाल उठने लगे हैं। चटोरी गली के बाहर, विशेषकर वीर बहादुर सिंह की प्रतिमा के सामने, बड़ी संख्या में मोमो, चाट और फास्ट फूड के ठेले लग गए हैं। इन ठेलों के कारण न केवल चटोरी गली की मूल अवधारणा और सौंदर्य प्रभावित हो रहा है, बल्कि क्षेत्र में लगातार यातायात जाम की समस्या भी उत्पन्न हो रही है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि जब चटोरी गली के भीतर वाहनों का प्रवेश प्रतिबंधित है और दुकानों को नियोजित ढंग से संचालित किया जा रहा है, तो बाहर सड़कों पर ठेले लगाने की अनुमति कैसे दी जा रही है। ठेलों के कारण सड़क संकरी हो जाती है, जिससे पैदल चलने वालों और वाहनों दोनों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। शाम के समय स्थिति और भी गंभीर हो जाती है, जब भारी भीड़ के कारण कई बार लंबा जाम लग जाता है।
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि इन ठेलों को लगाने की अनुमति किन परिस्थितियों में दी जा रही है। वहां तैनात पुलिसकर्मी, नगर निगम के कर्मचारी अथवा अन्य संबंधित विभाग इस पर स्थिति स्पष्ट नहीं कर पा रहे हैं। आमजन के बीच चर्चा है कि बिना किसी मौन सहमति के इतने बड़े पैमाने पर ठेलों का लगना संभव नहीं है। यदि ऐसा नहीं है, तो फिर इनके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही।
नगर निगम और पुलिस प्रशासन से मांग की जा रही है कि पूरे मामले की गंभीरता से जांच की जाए। यदि चटोरी गली को वास्तव में एक आदर्श फूड स्ट्रीट के रूप में विकसित करना है, तो उसके बाहर लग रहे अवैध ठेलों पर तत्काल रोक लगाई जाए और यातायात व्यवस्था को सुचारू किया जाए। अन्यथा यह महत्वाकांक्षी योजना अपने उद्देश्य से भटकती नजर आएगी और आम जनता को इसका अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाएगा।
चटोरी गली के उद्देश्य पर सवाल, बाहर लगे ठेलों से बिगड़ रहा स्वरूप और बढ़ रहा जाम
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