Saturday, November 29, 2025
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विकास के दावों में दबी जनता की सच्चाई — जमीनी हालात ने खोली जिम्मेदारों की पोल

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। प्रदेश सरकार और विभागों के दावों में विकास के चमकदार चित्र भले ही रंगे जा रहे हों, लेकिन हकीकत का कैनवास आज भी धूसर ही दिखाई दे रहा है। शहरों से लेकर गांवों तक बुनियादी सुविधाओं की जमीनी तस्वीर जनता की पीड़ा को खुलकर बयान कर रही है। हालात यह हैं कि विकास के नाम पर योजनाएं तो कागजों में पूरी दिखती हैं, लेकिन जनता आज भी उन्हीं पुरानी मुश्किलों से जूझ रही है जिनका समाधान वर्षों से सिर्फ फाइलों में ढूंढा जा रहा है।

ग्राम पंचायतों में टूटी सड़कों, जल निकासी की समस्या, गंदगी और अंधेरी गलियों से लेकर शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा जैसे मूलभूत मुद्दों पर जनता की आवाज़ लगातार उठती रही है,लेकिन जिम्मेदारों की चुप्पी ने लोगों की आशाओं को क्षीण कर दिया है। कई मोहल्लों में नालियां महीनों से जाम पड़ी हैं।

सड़कों पर गड्ढों का राज कायम है और पीने के पानी की समस्या ने आमजन को बेहाल कर दिया है। विभागीय अधिकारी अपने दौरे और बैठकों में बेहतर इंतजामों के दावे जरूर करते हैं, लेकिन हकीकत में उन दावों की जमीनी हकीकत जनता की परेशानी बनकर सामने आती है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि वे वर्षों से सुधार की आस लगाए बैठे हैं, लेकिन स्थिति जस की तस बनी हुई है।सवाल यह है कि आखिर विकास का वह चेहरा कहां है जिसे लेकर बड़े-बड़े मंचों से वादे किए जाते हैं? जनता यह जानने को मजबूर है कि योजनाओं का लाभ आखिर पहुंच किसे रहा है—क्योंकि जमीनी सच्चाई तो यह बताती है कि हालात अभी भी सुधरने का इंतजार कर रहे हैं।


लोगों का कहना है कि यदि जिम्मेदार समय रहते सक्रिय न हुए तो समस्याएं और भयावह रूप ले सकती हैं। जनता के मुद्दों को केवल कागज पर नहीं, जमीन पर उतारने की जरूरत है, तभी विकास का असली अर्थ पूरा हो पाएगा।

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