Tuesday, January 13, 2026
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विकास का शोर और प्रकृति का मौन क्रंदन

कैलाश सिंह

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। जब पहाड़ों की छाती चीर दी जाती है, जंगलों को उजाड़ दिया जाता है और जीवनदायिनी नदियों को नालों में तब्दील कर दिया जाता है, तब प्रकृति केवल घायल नहीं होती—वह भीतर तक रोती है। लेकिन इस करुण क्रंदन को सुनने के बजाय आधुनिक मानव गर्व से घोषणा करता है—यह विकास है। यही सोच आज न केवल भारत, बल्कि पूरे विश्व को एक गहरे पर्यावरणीय संकट की ओर धकेल चुकी है।
विकास के नाम पर मानव ने प्रकृति को सबसे बड़ा बलिदान बना दिया है। चौड़ी सड़कों, ऊंची इमारतों, विशाल औद्योगिक इकाइयों और अंधाधुंध खनन परियोजनाओं ने हरियाली को निगल लिया। जंगल कटे तो वर्षा चक्र बिगड़ गया, नदियां सिकुड़ीं तो जल संकट गहराया और हवा में जहर घुला तो बीमारियां आम हो गईं। यह सब होते हुए भी विकास की इस अंधी दौड़ पर कोई ब्रेक नहीं लगाया गया।
पर्यावरणीय असंतुलन के दुष्परिणाम अब स्पष्ट दिखाई देने लगे हैं। जलवायु परिवर्तन केवल वैज्ञानिक रिपोर्टों की भाषा नहीं रहा, बल्कि आम जनजीवन की सच्चाई बन चुका है। असमय बारिश से किसानों की फसलें चौपट हो रही हैं, भीषण गर्मी ने जनजीवन को बेहाल कर दिया है, तो कहीं बाढ़ और कहीं सूखे ने लाखों लोगों को विस्थापन की कगार पर ला खड़ा किया है। ये प्राकृतिक आपदाएं नहीं, बल्कि मानव निर्मित संकट हैं—जो हमारी नीतिगत लापरवाही और प्रकृति के प्रति संवेदनहीनता का परिणाम हैं।
जैव विविधता का तेजी से समाप्त होना एक और गंभीर चेतावनी है। वन्य जीवों के प्राकृतिक आवास छिन रहे हैं, कई प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर हैं और पारिस्थितिकी तंत्र की संतुलित श्रृंखला टूटती जा रही है। इसका सीधा प्रभाव मानव जीवन पर पड़ रहा है, लेकिन फिर भी हम इसे केवल पर्यावरण की समस्या मानकर नजरअंदाज कर देते हैं।
विडंबना यह है कि जिस विकास को मानव अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानता है, वही विकास आज उसके अस्तित्व के लिए खतरा बनता जा रहा है। प्रदूषित हवा सांस लेने लायक नहीं रही, नदियों और भूजल में घुला जहर पीने योग्य नहीं बचा और रासायनिक खेती से उत्पन्न भोजन धीरे-धीरे स्वास्थ्य को खोखला कर रहा है। सुविधाएं बढ़ीं, लेकिन जीवन की गुणवत्ता घटती चली गई। प्रश्न यह है कि क्या यही विकास का अर्थ है?
आज आवश्यकता है आत्म-मंथन की। यह स्वीकार करना होगा कि विकास और प्रकृति एक-दूसरे के शत्रु नहीं हैं। सच्चा विकास वही है, जो प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर आगे बढ़े। टिकाऊ विकास ही एकमात्र रास्ता है, जिसमें आर्थिक प्रगति के साथ पर्यावरण संरक्षण भी समान रूप से महत्वपूर्ण हो। वृक्षारोपण केवल औपचारिकता न बने, नवीकरणीय ऊर्जा को विकल्प नहीं बल्कि प्राथमिकता बनाया जाए, जल संरक्षण को जनआंदोलन का रूप दिया जाए और प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग सुनिश्चित किया जाए।
इसके लिए केवल सरकारों या नीतियों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। प्रत्येक नागरिक को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। उपभोग की असीमित प्रवृत्ति पर संयम, प्रकृति के प्रति संवेदनशील व्यवहार और पर्यावरण के अनुकूल जीवनशैली ही भविष्य को सुरक्षित कर सकती है।
यदि मानव ने अब भी प्रकृति की पीड़ा को अनसुना किया, तो आने वाला समय और भी भयावह होगा। तब विकास के सारे दावे खोखले साबित होंगे और सभ्यता की प्रगति केवल कागजी आंकड़ों तक सिमटकर रह जाएगी। सच यही है—प्रकृति बचेगी तो मानव बचेगा। अन्यथा इतिहास गवाह बनेगा कि जब प्रकृति रो रही थी, तब मानव केवल विकास का शोर मचाने में व्यस्त था।

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