Friday, February 13, 2026
Homeउत्तर प्रदेशतकनीक के युग में तप की जरूरत: गति के बीच संतुलन की...

तकनीक के युग में तप की जरूरत: गति के बीच संतुलन की तलाश

कैलाश सिंह

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। इक्कीसवीं सदी को तकनीक की सदी कहा जाता है। मोबाइल, इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने जीवन को तेज, सुविधाजनक और प्रभावी बना दिया है। कामकाज से लेकर रिश्तों तक, हर क्षेत्र में तकनीक की गहरी मौजूदगी है। लेकिन इस तेज़ रफ्तार प्रगति के बीच मनुष्य का मन ठहराव खोता जा रहा है। बाहरी विकास जितना तेज़ हुआ है, भीतर की शांति उतनी ही दुर्लभ होती चली गई है। ऐसे समय में तप की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है।
आज तप का अर्थ जंगलों में जाकर कठोर साधना करना नहीं, बल्कि विवेक, संयम और अनुशासन के साथ जीवन जीना है। तकनीक ने हमें एक-दूसरे से जोड़ दिया है, लेकिन विडंबना यह है कि हम स्वयं से दूर होते जा रहे हैं। लगातार स्क्रीन पर बिताया गया समय, सूचनाओं की बाढ़ और आभासी दुनिया ने मन को चंचल बना दिया है। ध्यान की क्षमता घट रही है और धैर्य कमजोर पड़ता जा रहा है। ऐसे में इच्छाओं पर नियंत्रण और मन की स्थिरता ही आधुनिक तपस्या है।
भारतीय परंपरा में तप का अर्थ कष्ट सहना नहीं, बल्कि आत्म- अनुशासन रहा है। सीमित उपभोग, समय पर सोना-जागना, सत्य और करुणा का पालन—ये सभी तप के ही स्वरूप हैं। तकनीक जब साधन बनती है तो जीवन को सरल बनाती है, लेकिन जब वही साध्य बन जाए, तो मनुष्य यंत्रवत हो जाता है। तप हमें यह विवेक देता है कि आवश्यकता और आकर्षण में अंतर कैसे किया जाए।
आज बढ़ता तनाव, अवसाद और पारिवारिक विघटन इस बात की चेतावनी हैं कि तकनीकी सुविधा मानसिक संतुलन का विकल्प नहीं हो सकती। समाज को ऐसे नागरिक चाहिए जो दक्ष होने के साथ संवेदनशील भी हों। अनावश्यक स्क्रीन समय से दूरी, मौन के क्षण और स्वयं से संवाद—यही आधुनिक युग की सच्ची साधनाएं हैं।
अंततः, तकनीक जीवन को तेज़ बना सकती है, लेकिन उसे अर्थ तप ही देता है। यदि प्रगति को मानव कल्याण की दिशा देनी है, तो तप को फिर से जीवन के केंद्र में लाना होगा।

RELATED ARTICLES
- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments