काश! मेरी चाहत पूरी हो जाती,
मित्र संग एक कप चाय हो जाती,
आइये आपको चाय पिलाता हूँ,
या बुला लीजिये चाय पे आता हूँ।
हाथ कंगन को आरसी क्या,
पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या,
झिझक कयों, शर्माना क्यों,
चाय के लिए तकल्लुफ़ क्यों।
गुलाब का फूल ख़ुशबू दे जाता है,
गुज़रा हुआ वक्त यादें दे जाता है,
हर एक का अपना अंदाज़ होता है,
कोई ज़िंदगी, कोई प्रेम दे जाता है।
सात रोज दे था आठ प्रपोज़ दे था
नौ चाकलेट दे है, दस को टेडी दे है
ग्यारह प्रोमिज दे बारह को हग दे,
तेरह किस दे, चौदह वैलेंटाइन दे।
फागुन महीना प्रेम का मधुमास है,
वसंत बहार है, सुहानी हुई आस है,
आदित्य जाति पाँति सब छोड़ते हैं,
हम एक हैं, मिलकर देते संदेश हैं।
- डा० कर्नल
आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’
