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उच्च शिक्षा में ‘मार्केट फॉर लेमन्स’: गुणवत्ता बनाम विस्तार की चुनौती

लेखिका: डॉ. प्रियंका सौरभ

हरियाणा (राष्ट्र की परम्परा)। भारत में उच्च शिक्षा का तीव्र विस्तार अवसरों के साथ-साथ गंभीर चुनौतियाँ भी लेकर आया है। एक ओर विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों और निजी शिक्षण संस्थानों की संख्या तेजी से बढ़ी है, वहीं दूसरी ओर गुणवत्ता, पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर लगातार प्रश्न उठ रहे हैं। ऐसे समय में अर्थशास्त्री जॉर्ज अकेलॉफ का ‘मार्केट फॉर लेमन्स’ सिद्धांत अत्यंत प्रासंगिक दिखाई देता है। इस सिद्धांत के अनुसार जब उपभोक्ता को किसी वस्तु की वास्तविक गुणवत्ता की सही जानकारी नहीं होती, तब निम्न गुणवत्ता वाले उत्पाद बाजार पर हावी हो जाते हैं और अच्छे उत्पाद पीछे हट जाते हैं। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में विद्यार्थी उपभोक्ता हैं और संस्थान सेवा प्रदाता। जब विद्यार्थियों को संस्थानों की वास्तविक स्थिति, शिक्षकों की गुणवत्ता, रोजगार संभावनाओं, शोध कार्य और आधारभूत सुविधाओं की सही जानकारी नहीं मिलती, तब वे कमज़ोर संस्थानों में प्रवेश लेने को विवश हो जाते हैं।

भारत में उच्च शिक्षा का विस्तार मुख्य रूप से नीतिगत प्रयासों के कारण हुआ है। नई शिक्षा नीति ने उच्च शिक्षा में नामांकन बढ़ाने, दूरस्थ शिक्षा को प्रोत्साहन देने, ऑनलाइन शिक्षण को बढ़ावा देने और निजी निवेश को आकर्षित करने पर बल दिया।

इससे शिक्षा तक पहुँच बढ़ी और अधिक विद्यार्थियों को अवसर मिला, परंतु संस्थानों की गुणवत्ता उसी गति से विकसित नहीं हो सकी। अनेक निजी संस्थान आकर्षक विज्ञापन, भव्य परिसर और बड़े-बड़े दावे करके विद्यार्थियों को अपनी ओर खींचते हैं, जबकि वास्तविकता में वहाँ योग्य शिक्षक, शोध वातावरण और रोजगारपरक शिक्षा का अभाव होता है। सरकारी आँकड़े भी अक्सर विलंब से आते हैं या सामान्य लोगों की समझ से परे जटिल रूप में उपलब्ध होते हैं। परिणामस्वरूप विद्यार्थी और अभिभावक सही निर्णय नहीं ले पाते। यही स्थिति निम्न गुणवत्ता वाले शिक्षा बाजार को जन्म देती है।

इसी समस्या को दूर करने के लिए भारत सरकार ने राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग व्यवस्था प्रारंभ की। इसका उद्देश्य देश के उच्च शिक्षण संस्थानों का मूल्यांकन निश्चित मानकों के आधार पर करना है। इसमें शिक्षण व्यवस्था, संसाधन, शोध कार्य, स्नातक परिणाम, समावेशन और प्रतिष्ठा जैसे पहलुओं को देखा जाता है। इस व्यवस्था ने पहली बार विद्यार्थियों को एक ऐसा मंच दिया जहाँ वे विभिन्न संस्थानों की तुलनात्मक स्थिति जान सकते हैं। इससे संस्थानों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा बढ़ी और अनेक महाविद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों ने शिक्षकों की नियुक्ति, शोध प्रकाशनों, रोजगार सहायता केंद्रों और आधारभूत सुविधाओं में सुधार करना प्रारंभ किया।

इस रैंकिंग व्यवस्था की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि उसने उच्च शिक्षा क्षेत्र में गुणवत्ता के संकेत उपलब्ध कराए। अब विद्यार्थी केवल विज्ञापनों या प्रचार सामग्री पर निर्भर नहीं रहते, बल्कि संस्थान की स्थिति, शोध प्रदर्शन, परीक्षा परिणाम और समावेशन जैसी जानकारियों को देखकर निर्णय ले सकते हैं। इससे सूचना के अभाव की समस्या में कुछ कमी आई है। सरकार के लिए भी यह एक महत्त्वपूर्ण नीति उपकरण सिद्ध हुआ है, जिसके माध्यम से विभिन्न संस्थानों की स्थिति का तुलनात्मक अध्ययन संभव हुआ है।
फिर भी यह व्यवस्था पूर्ण समाधान नहीं है। इसकी सबसे बड़ी सीमा यह है कि यह काफी हद तक संस्थानों द्वारा स्वयं दिए गए आँकड़ों पर आधारित रहती है। यदि कोई संस्थान गलत या बढ़ा-चढ़ाकर जानकारी दे, तो रैंकिंग की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। दूसरा, शोध कार्य को अधिक महत्व मिलने से वे महाविद्यालय पीछे रह जाते हैं जो मुख्य रूप से शिक्षण पर केंद्रित हैं।

तीसरा, ग्रामीण क्षेत्रों या नवस्थापित संस्थानों के लिए बड़े और पुराने शहरी संस्थानों से प्रतिस्पर्धा करना कठिन हो जाता है। चौथा, रैंकिंग वर्ष में एक बार आती है, जबकि विद्यार्थियों को कई बार वास्तविक समय की जानकारी की आवश्यकता होती है। पाँचवाँ, देश के विशाल उच्च शिक्षा ढाँचे की तुलना में सीमित संस्थान ही प्रमुखता से सामने आते हैं, जिससे अनेक संस्थान पारदर्शी मूल्यांकन से बाहर रह जाते हैं।

विश्व स्तर पर विभिन्न देशों में विश्वविद्यालयों की रैंकिंग के लिए ऐसे मॉडल अपनाए जाते हैं जिनमें पूर्व छात्रों की संतुष्टि, अंतरराष्ट्रीय पहचान, नियोक्ताओं की राय, शोध प्रभाव और वैश्विक सहयोग जैसे पहलुओं को भी महत्व दिया जाता है। भारत भी अपनी व्यवस्था को अधिक व्यापक और बहुआयामी बनाकर इन अनुभवों से सीख सकता है।

विद्यार्थियों के हितों की रक्षा के लिए कुछ ठोस सुधार आवश्यक हैं। सबसे पहले, संस्थानों द्वारा दिए गए आँकड़ों का स्वतंत्र एजेंसियों से सत्यापन कराया जाए, ताकि गलत जानकारी देने की प्रवृत्ति समाप्त हो। दूसरा, शिक्षण गुणवत्ता, छात्र-शिक्षक अनुपात, रोजगार उपलब्धता और शुल्क के मुकाबले लाभ को अधिक महत्व दिया जाए। तीसरा, केवल क्रम संख्या देने के स्थान पर समूह आधारित श्रेणी व्यवस्था अपनाई जाए, जिससे छोटे और उभरते संस्थानों को भी सम्मानजनक स्थान मिल सके।

चौथा, एक केंद्रीकृत डिजिटल मंच विकसित किया जाए जहाँ प्रत्येक संस्थान की अद्यतन जानकारी उपलब्ध हो। पाँचवाँ, राज्य स्तर और क्षेत्रीय स्तर पर भी रैंकिंग तैयार की जाए, ताकि स्थानीय विद्यार्थियों को अपने आसपास बेहतर विकल्प मिल सकें। छठा, विद्यार्थियों और अभिभावकों की प्रतिक्रिया को भी मूल्यांकन प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जाए।

अंततः उच्च शिक्षा केवल संस्थानों की संख्या बढ़ाने का विषय नहीं है, बल्कि गुणवत्ता, विश्वास और समान अवसर का प्रश्न है। यदि पारदर्शिता का अभाव रहेगा तो विद्यार्थी निम्न स्तर के संस्थानों के जाल में फँसते रहेंगे और उनका भविष्य प्रभावित होगा। राष्ट्रीय रैंकिंग व्यवस्था ने सकारात्मक शुरुआत अवश्य की है, किंतु इसे अधिक स्वतंत्र, विश्वसनीय और विद्यार्थी-केंद्रित बनाना समय की आवश्यकता है। जब सही जानकारी, प्रभावी नियमन और गुणवत्तापूर्ण संस्थान एक साथ सामने आएँगे, तभी भारत वास्तव में ज्ञान आधारित विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ सकेगा।

Karan Pandey

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