कैलाश सिंह
महाराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)।आज की वैश्विक परिस्थितियां अशांति, युद्ध, आतंकवाद, वैमनस्य और मानसिक तनाव से घिरी हुई हैं। आधुनिक युग में भौतिक प्रगति ने मानव जीवन को सुविधाजनक तो बनाया, किंतु आंतरिक शांति को गहराई से प्रभावित किया है। ऐसे संकटपूर्ण समय में यदि कोई दर्शन मानवता को स्थायी शांति का मार्ग दिखाता है, तो वह है सनातन चिंतन—जो केवल एक धर्म नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित करने वाली शाश्वत विचारधारा है।
सनातन चिंतन की मूल भावना “वसुधैव कुटुम्बकम्” है, जिसका आशय है कि संपूर्ण विश्व एक परिवार है। यही विचार विश्व शांति की आधार शिला है। जब मनुष्य स्वयं को समस्त सृष्टि से जुड़ा हुआ अनुभव करता है, तब युद्ध, हिंसा और शोषण की प्रवृत्तियां स्वतः समाप्त होने लगती हैं। ईशावास्यमिदं सर्वम् का सिद्धांत सभी प्राणियों में एक ही चेतना का बोध कराता है, जो सहअस्तित्व और करुणा को जन्म देता है।
वर्तमान समय में जब राष्ट्र स्वार्थ, सत्ता और संसाधनों के लिए आमने-सामने खड़े हैं, तब सनातन चिंतन अहिंसा, संयम और सहिष्णुता का मार्ग दिखाते है। भगवान बुद्ध, महावीर स्वामी और श्रीकृष्ण जैसे महापुरुषों ने कर्म, करुणा और कर्तव्य के माध्यम से शांति का व्यावहारिक स्वरूप प्रस्तुत किया। श्रीमद्भगवद्गीता का कर्मयोग यह सिखाता है कि कर्तव्य का पालन करते हुए भी वैराग्य और मानसिक संतुलन बनाए रखा जा सकता है।
सनातन चिंतन बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक शांति पर विशेष बल देता है। योग, ध्यान और आत्मचिंतन व्यक्ति के मन को स्थिर कर नकारात्मक और हिंसक प्रवृत्तियों पर नियंत्रण स्थापित करते हैं। जब व्यक्ति शांत होता है, तभी समाज और राष्ट्र में शांति की स्थापना संभव होती है। आज विश्व जिस मानसिक तनाव, अवसाद और असंतुलन से जूझ रहा है, उसका समाधान सनातन योग-दर्शन में स्पष्ट रूप से निहित है।
पर्यावरण संरक्षण भी सनातन चिंतन का अभिन्न अंग है। प्रकृति को माता मानने की परंपरा मानव को संतुलित और जिम्मेदार जीवन जीने की प्रेरणा देती है। नदियां, पर्वत, वृक्ष और जीव-जंतु—सभी के प्रति सम्मान का भाव ही स्थायी शांति का मार्ग प्रशस्त करता है। आज पर्यावरण विनाश वैश्विक संकट बन चुका है, जिसका समाधान सनातन की प्रकृति-पूजक चेतना में स्पष्ट दिखाई देता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि विश्व केवल सनातन चिंतन को जाने ही नहीं, बल्कि उसके मूल्यों को व्यवहार में उतारे। शांति केवल समझौतों और संधियों से नहीं आती, बल्कि संस्कारों से जन्म लेती है। सनातन चिंतन मनुष्य को पहले मानव बनाता है, फिर किसी राष्ट्र का नागरिक।
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि विश्व शांति का मार्ग सनातन चिंतन से होकर ही गुजरता है। यह एक ऐसा शाश्वत दर्शन है, जो समय, सीमा और जाति से परे सम्पूर्ण मानवता को जोड़ता है। यदि विश्व को वास्तव में शांत, सुरक्षित और संतुलित बनाना है, तो सनातन के सिद्धांतों को ग्रंथों तक सीमित न रखकर जीवन में उतारना होगा।
