मुद्राओं में दिखता है प्राचीन मंदिरों का स्वरूप: प्रो. राजवन्त राव

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। राजकीय बौद्ध संग्रहालय, गोरखपुर में चल रही सात दिवसीय “प्राचीन भारतीय अभिलेख एवं मुद्राएं-अभिरुचि कार्यशाला” की राष्ट्रीय व्याख्यान श्रृंखला के अंतर्गत शुक्रवार को यशोधरा सभागार में चतुर्थ व्याख्यान आयोजित हुआ। व्याख्यान में प्रो. राजवन्त राव (प्राचीन इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग, दी.द.उ. गोरखपुर विश्वविद्यालय) ने “मुद्राओं पर प्रतिबिंबित धार्मिक वास्तु” विषय पर विस्तार से प्रकाश डाला।
प्रो. राजवन्त राव ने कहा कि हिंदू मंदिर भारतीयों की सृजनशीलता और अद्भुत मेधा शक्ति का परिचायक हैं। उन्होंने बताया कि भारत में प्रारंभिक काल में देवालयों के लिए ‘मंदिर’ शब्द का प्रयोग नहीं होता था। उस समय ‘प्रासाद’, ‘देवसदन’ और ‘देवगृह’ जैसे शब्द प्रचलित थे। ‘मंदिर’ शब्द का प्रयोग परवर्ती काल में कलचुरी शासक युवराज द्वितीय के समय मिलता है। भारतीय मुद्राओं के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व में किसी न किसी रूप में मंदिरों का अस्तित्व था।
उन्होंने आगाथाक्लिज की मुद्राओं पर मंदिर वास्तु के प्रारंभिक स्वरूप, सहगोरा ताम्रपत्र में वेदिका में वृक्ष, अर्धचंद्र युक्त त्रिमेरु और दो मंजिला वास्तु आकृतियों का उल्लेख किया। विद्वानों के अनुसार दो मंजिला वास्तु को अन्नागार के स्वरूप से जोड़ा गया है, जिसे कौटिल्य के अर्थशास्त्र में लोक देवी की संज्ञा दी गई है। शक शासक षोडास के मथुरा लेख में पंचवीरों की प्रतिमाओं का उल्लेख मिलता है। मेरु, मंदर और कैलाश को भी मंदिरों के प्रकार के रूप में देखा जाता है। सारनाथ और श्रावस्ती से प्राप्त कनिष्क के अभिलेखों में बोधिसत्व प्रतिमाओं पर छत्रयष्टि लगाने का उल्लेख मिलता है। अयोध्या के शासक धनदेव के अभिलेखों तथा पांचाल नरेशों की ताम्र मुद्राओं पर भी मंदिर वास्तु के प्रारूप दिखाई देते हैं। यौधेय और औदुम्बर जैसे गण राज्यों की मुद्राओं में भी प्राचीन मंदिर स्वरूप के साक्ष्य मिलते हैं।
कार्यशाला संयोजक डॉ. यशवन्त सिंह राठौर ने बताया कि भारत में धार्मिक प्रतिष्ठानों के स्वरूप को मुद्राओं और अभिलेखों में अभिव्यक्त किया गया है। दक्षिण भारत में मदुरा के समीप बोदिनायकुरु से प्राप्त आहत मुद्राओं पर अंकित वास्तु को शिव मंदिर के संकेत के रूप में पहचाना गया है, जिनका काल द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व माना जाता है। इन अध्ययनों से शिव और कार्तिकेय से संबंधित प्रारंभिक धार्मिक प्रतिष्ठानों के साक्ष्य सामने आते हैं।
समापन सत्र में प्रो. रामप्यारे मिश्र ने पुरातत्व और अभिलेखों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए सभी का आभार व्यक्त किया। चतुर्थ व्याख्यान दिवस में लगभग 70 प्रतिभागियों के साथ संग्रहालय के कार्मिक भी उपस्थित रहे।

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