Monday, April 6, 2026
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भागवत कथा में शुकदेव-परीक्षित संवाद और भक्ति का महत्व बताया गया

बरहज/देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)। नगर के रुद्रपुर स्टैंड पर आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन सोमवार को कथा व्यास आचार्य राघवेंद्र ने शुकदेव द्वारा परीक्षित को दिए गए उपदेशों का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने आसन, श्वास, संग और इन्द्रियों पर नियंत्रण रखते हुए बुद्धि के माध्यम से मन को भगवान के स्थूल रूप में लगाने की महत्ता बताई।

कथा के दौरान सृष्टि क्रम का वर्णन करते हुए ब्रह्मा की संकल्प सृष्टि, चार ऋषियों की उत्पत्ति, दस ऋषियों का प्राकट्य, छाया से कर्दम, वाणी से सरस्वती, वाम भाग से सतरूपा और दक्षिण भाग से मनु की उत्पत्ति का प्रसंग सुनाया गया। मनु की संतानों में देवहूति, आकूति, प्रसूति, उतानपाद और प्रियव्रत का उल्लेख करते हुए उनके जीवन प्रसंगों को विस्तार से बताया गया।

देवहूति और कर्दम के विवाह तथा कपिल भगवान के जन्म, सांख्य दर्शन के उपदेश, आकूति और रुचि प्रजापति, प्रसूति और दक्ष प्रजापति के विवाह, सती और शिव विवाह तथा दक्ष यज्ञ विध्वंस जैसे प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन किया गया। इसके साथ ही ध्रुव चरित्र, अंग, वेन, पृथु, प्राचीनबरही, प्रियव्रत, ऋषभ और जड़भरत की कथाओं के माध्यम से जीवन मूल्यों पर प्रकाश डाला गया।

कथा में अजामिल, वृत्रासुर और प्रह्लाद के प्रसंगों का वर्णन करते हुए बताया गया कि हर परिस्थिति में भक्ति और समभाव बनाए रखना चाहिए। भगवान के दरबार में जाति-पाति या पद का कोई भेदभाव नहीं होता, सभी समान हैं।

कार्यक्रम में यजमान विवेकानंद तिवारी, उषा तिवारी, डॉ अजय मिश्र, डॉ प्रदीप मिश्र, रामेश्वर यादव, सोनकर, बलभद्र तिवारी, राजेन्द्र सिंह, हृदयेश तिवारी, श्रीराम वर्मा, शिवशंकर जायसवाल, अशोक सोनकर, विजयकांत मिश्र, रमेश तिवारी सहित अनेक श्रद्धालु उपस्थित रहे। आयोजक अभयानंद तिवारी ने सभी कथा प्रेमियों का आभार व्यक्त किया।

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