दिल्ली में प्रदर्शन, पुलिस की कार्रवाई और पाबंदियां: सुप्रीम कोर्ट ने साफ की सीमा, 13 अक्टूबर को फिर सुनवाई
नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। दिल्ली में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई और आवाजाही पर लगाई गई पाबंदियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहन की पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि शांतिपूर्ण और निहत्थे लोगों को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में नहीं रखा जा सकता। अदालत ने शहर में लोगों की आवाजाही सामान्य रखने, इंटरनेट सेवाएं निर्बाध जारी रखने और मेट्रो सेवाओं का संचालन सामान्य समय-सारिणी के अनुसार करने के निर्देश दिए। साथ ही, बैरिकेडिंग की आवश्यकता की समीक्षा करने को भी कहा।
प्रदर्शन का अधिकार है, लेकिन कानून का पालन भी जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों का अधिकार है, लेकिन प्रदर्शन का तरीका कानून के दायरे में होना चाहिए। अदालत के सामने सवाल था कि पुलिस की ओर से लगाई गई पाबंदियां संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत किस सीमा तक उचित हैं। पीठ ने स्पष्ट किया कि विरोध-प्रदर्शन के अधिकार को पुलिस कानून से ऊपर नहीं माना जा सकता, लेकिन कानून-व्यवस्था के नाम पर नागरिकों के वैध अधिकारों पर अनुचित रोक भी नहीं लगाई जानी चाहिए।
हिरासत और आवाजाही पर अदालत की अहम टिप्पणी
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि शांतिपूर्ण और निहत्थे लोगों को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए। खास तौर पर उस क्षेत्र के बाहर, जहां भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 163 के तहत प्रतिबंध लागू हैं, ऐसी कार्रवाई कानून के निर्धारित प्रावधानों के अनुसार ही होनी चाहिए। अदालत ने अधिकारियों से यह भी सुनिश्चित करने को कहा कि शहर में आम लोगों की आवाजाही बाधित न हो।
सुप्रीम कोर्ट के आसपास भी धारा 163 के तहत प्रतिबंध लगाए जाने का मुद्दा उठा। इस पर अदालत ने संबंधित अधिकारियों को प्रतिबंध हटाने का निर्देश दिया, ताकि लोगों को शीर्ष अदालत तक पहुंचने और न्याय पाने में परेशानी न हो।
इंटरनेट और मेट्रो सेवाओं को लेकर क्या कहा?
सुनवाई के दौरान अदालत ने इंटरनेट सेवाओं को बिना रुकावट जारी रखने पर जोर दिया। मेट्रो और ट्रेनों के संचालन को लेकर भी कहा गया कि सेवाएं पूरी तरह बंद करने के बजाय आवश्यक नियंत्रण के साथ उनका संचालन जारी रखा जाए। अदालत ने बैरिकेडिंग की जरूरत की समीक्षा करने और यह सुनिश्चित करने को कहा कि सुरक्षा व्यवस्था आम नागरिकों के लिए अनावश्यक बाधा न बने।
कपिल सिब्बल ने उठाए पुलिस कार्रवाई पर सवाल
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने सुनवाई के दौरान हिरासत में लेने की कार्रवाई और बीएनएसएस की धारा 163 के तहत लगाए गए प्रतिबंधों पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि लोगों को ट्रेनों से भी हिरासत में लिया जा रहा है और इंटरनेट सेवाओं में बाधा का मुद्दा भी गंभीर है। सिब्बल ने इंटरनेट बंद करने से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट के अनुराधा भसीन फैसले का उल्लेख किया।
वरिष्ठ अधिवक्ता शहदान फरासत ने आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिस का व्यवहार अनुचित था और कुछ लोगों को जबरन बसों में बैठाया गया। अधिवक्ता एन. हरिहरन ने भी कहा कि पाबंदियों के कारण आम लोगों के लिए शहर में स्वतंत्र रूप से घूमना मुश्किल हो रहा है।
दो याचिकाओं के जरिए उठाया गया मामला
इस मामले में दो याचिकाएं दाखिल की गई थीं। पहली याचिका अधिवक्ता शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी ने दायर की, जिसमें केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन, दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार और दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (डीएमआरसी) के अध्यक्ष डी. थारा के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू करने की मांग की गई। याचिका में आरोप लगाया गया कि 9 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट की ओर से दिए गए आदेश का पालन नहीं हुआ।
दूसरी याचिका वरिष्ठ अधिवक्ता और तृणमूल कांग्रेस की राज्यसभा सांसद मेनका गुरुस्वामी ने दाखिल की। इसमें दिल्ली में विपक्षी नेताओं को एहतियातन हिरासत में लेने की कार्रवाई को चुनौती दी गई। याचिका में दलील दी गई कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के मौलिक अधिकार को दबाने के लिए एहतियाती हिरासत का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।
‘देश की सेवा के लिए हमेशा मौजूद हैं’, जस्टिस बागची की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने मामले की तत्काल सुनवाई करने के लिए अदालत का आभार जताया। इस पर जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा, “हम देश की सेवा के लिए हमेशा मौजूद हैं।” केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता अदालत में पेश हुए।
13 अक्टूबर को फिर होगी सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026 को निर्धारित की है। अब अगली सुनवाई में यह देखा जाएगा कि अदालत के अंतरिम निर्देशों का पालन किस तरह किया गया और प्रदर्शनकारियों के अधिकारों तथा कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए क्या कदम उठाए गए।
संदेश साफ है: सुरक्षा के नाम पर नागरिक अधिकारों की अनदेखी नहीं
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से स्पष्ट संदेश मिलता है कि लोकतंत्र में विरोध दर्ज कराने का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन उसका इस्तेमाल कानून के दायरे में होना चाहिए। इसी तरह, कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी निभाते समय प्रशासन को भी नागरिकों की स्वतंत्रता, निर्बाध संचार और न्याय तक पहुंच का ध्यान रखना होगा।
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