“एसआईआर : सरकारी लापरवाही की कीमत कर्मचारियों की जान से क्यों चुकाई जाए?

”लेख –

सलेमपुर के धनगड़ा ग्राम निवासी युवा लेखपाल आशीष कुमार (30 वर्ष) की मौत केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन की अव्यवस्थित और कठोर प्रणाली की भयावह तस्वीर है। यह घटना बताती है कि नीतियों की कुर्सी पर बैठे लोग जब ज़मीनी वास्तविकता से दूर निर्णय लेते हैं, तो उसकी कीमत सबसे पहले व्यवस्था की रीढ़—फील्ड कर्मचारियों—को चुकानी पड़ती है।सरकार द्वारा जारी एसआईआर (Special Summary Revision) एक प्रशासनिक प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना होता है। उद्देश्य भले ही जनहित का हो, लेकिन इसे जिस प्रकार बिना तैयारी, बिना मानव-बल और बिना निर्देशों की स्पष्टता के लागू किया , वह सीधे-सीधे कर्मचारियों को जोखिम में डालने के बराबर है।विडंबना यह है कि शासनादेश में लेखपाल को बीएलओ (BLO) की श्रेणी में रखा ही नहीं गया, इसके बावजूद जमीनी स्तर पर उन्हीं पर पूरा बोझ डाल दिया गया।इससे भी बड़ी चिंता की बात यह रही कि जब लेखपाल आशीष की मौत हुई, तब अधिकारी स्वयं असहाय खड़े दिखे। यह प्रशासनिक संवेदनहीनता का वह रूप है जिसे लोकतांत्रिक शासन में किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।सुबह 6 बजे से शाम 3 बजे तक जनता और संगठन सहायता की मांग लेकर खड़े रहे, लेकिन कोई अधिकारी मृतक की पत्नी और बच्चों को सहायता की न्यूनतम उम्मीद तक नहीं दे सका। यह दृश्य केवल प्रशासन की कमजोरी ही नहीं, बल्कि सरकार की उस नीतिगत ठंडक को उजागर करता है, जिसने कर्मचारियों की जीवन सुरक्षा को “प्रक्रिया” के नीचे कुचल दिया है।क्यों खतरनाक है यह प्रवृत्ति?सरकारी योजनाएँ बिना संसाधन, बिना स्टाफ और बिना तैयारी लागू हो रही हैं।फील्ड कर्मचारी “हमेशा उपलब्ध और हमेशा जिम्मेदार” समझे जाते हैं, पर उनकी सुरक्षा, स्वास्थ्य और मानव मर्यादा की बात कोई नहीं करता।शासनादेश और जमीनी निर्देशों में स्पष्ट विरोधाभास है।मृत्यु जैसी गंभीर घटनाओं पर भी तत्काल राहत की व्यवस्था नहीं—यह सीधे तंत्र की असफलता है।यदि ऐसे ही हालात रहे तो यह प्रवृत्ति और खतरनाक रूप ले सकती है, क्योंकि कर्मचारी व्यवस्था से टूटते जाएँगे और जनता का प्रशासन पर विश्वास भी कमजोर पड़ेगा।मृतक आशीष कुमार की मौत—एक चेतावनीआशीष की मृत्यु सिर्फ एक परिवार को नहीं, पूरे शासन तंत्र को यह याद दिलाती है कि—नीतियाँ तब तक जनहितैषी नहीं हो सकतीं, जब तक वे मानवीय, व्यावहारिक और ज़मीनी स्तर पर लागू करने योग्य न हों।एसआईआर की मौजूदा प्रक्रिया तभी सुरक्षित बन सकती है जबइसकी अवधि कम से कम 3 माह बढ़ाई जाए,कर्मचारियों को कार्य के अनुरूप स्पष्ट आदेश और पर्याप्त संसाधन दिए जाएँ,और सबसे महत्वपूर्ण—मृतक के परिवार को 1 करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता तत्काल घोषित की जाए।यह सहायता दया नहीं, बल्कि कर्तव्य है।क्योंकि सरकार की प्रक्रिया में आई खामियों का बोझ किसी परिवार को अपने प्रिय की जान देकर नहीं उठाना चाहिए।सरकारें बदलती रहती हैं, अभियान आते-जाते रहते हैं, लेकिन जीवन एक बार जाता है तो लौटकर नहीं आता।आशीष कुमार की मौत एक सवाल छोड़ जाती है—क्या हमारी प्रशासनिक मशीनरी इतनी निष्ठुर हो चुकी है कि वह कर्मचारियों की जान की कीमत भी नहीं समझती?समय है कि सरकार इस प्रश्न का ईमानदार जवाब दे—और उससे पहले मृतक परिवार के आंसू पोछे।कलम से…….संजयदीप कुशवाहाप्रदेश अध्यक्षराष्ट्रीय समानता दल उत्तर प्रदेश

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